Court of Sessions Trial under BNSS | Criminal procedure made easy. #legal #law #education
Jan 5, 2026
This video explains Trial before Court of Sessions under the Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (BNSS) in a clear, step-by-step manner.
We cover:
• Initiation of criminal proceedings
• Committal of case to Sessions Court
• Opening of the case by Public Prosecutor
• Discharge application and framing of charges
• Plea of guilty and prosecution evidence
• Examination of accused and defence evidence
• Final arguments and judgment
• Trial in absentia (Section 356)
• Victim rights (Section 193)
• Forensic mandate (Section 176)
This video is useful for:
✔ Law students
✔ Judicial Services aspirants
✔ Criminal law learners
✔ BNSS 2023 exam preparation
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हेलो एवरीवन एंड वेलकम बैक टू अ न्यू
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एपिसोड ऑफ जस्ट पी लॉजिकल। आज के वीडियो
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में हम भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023
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के अंडर ट्रायल बिफोर कोर्ट ऑफ सेशंस को
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स्टेप बाय स्टेप बिल्कुल एग्जाम रेडी
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तरीके से समझने वाले हैं। वीडियो के
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बीच-बीच में मैं आपसे क्वेश्चंस भी
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पूछूंगी। तो कमेंट करना मत भूलना। अगर आप
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लॉ स्टूडेंट, जुडिशियल एस्पिरेंट या
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क्रिमिनल प्रोसीजर पढ़ रहे हो तो यह
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वीडियो एंड तक देखना जरूरी है। और शुरू
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करने के पहले अगर आपको बीएएसएस 2023 के
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नोट्स चाहिए क्योंकि ये एक नया लॉ है।
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इसके नोट्स ऑनलाइन मिलना काफी डिफिकल्ट
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है। आपको Google पे या YouTube पे सर्च
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करना बहुत हेक्टिक पड़ सकता है। हमने इसके
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क्यूरेटेड नोट्स चाहे वो मॉड्यूल वाइज़ हो,
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चाहे वो एग्जाम के पॉइंट ऑफ व्यू से पढ़ना
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हो। हमने यह सारे नोट्स प्रिपेयर करे हैं।
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आप यह नोट्स कमर्सन के वेबसाइट से एक्सेस
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कर सकते हैं। हमारे कांटेक्ट सेक्शन में
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जाके एक क्वेरी ड्रॉप करिए और हमारे नोट्स
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एक्सेस करिए। कमर्सन का लिंक डिस्क्रिप्शन
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में दिया है। जल्दी जाइए और एक्सेस करिए
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नोट्स। और विदाउट एनी फर्दर अडू लेट्स गेट
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इंटू द वीडियो।
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बीएएसएस का ऑब्जेक्टिव जानते हैं हम। सबसे
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पहले एक सवाल बीएएसएस 2023 लाया ही क्यों
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गया? बीएएसएस का मेन ऐ है क्रिमिनल
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प्रोसीजर को क्लियर और यूनिफॉर्म बनाना।
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टाइम टू टाइम बाउंड बनाना और टेक्नोलॉजी
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का इफेक्टिव यूज़ करना। बीएएनएसएस में
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अलग-अलग ट्रायल का प्रोसीजर दिया गया है।
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जैसे ट्रायल बिफोर कोर्ट ऑफ़ सेशंस, ट्रायल
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बाय मैजिस्ट्रेट एज एन वारंट केसेस, समंस
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केसेस, समरी ट्रायल्स
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पर आज हम सिर्फ ट्रायल बिफोर कोर्ट ऑफ
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सेशंस पर फोकस करेंगे। चलिए जानते हैं
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ट्रायल की शुरुआत कैसे होती है? अब यहां
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पे एक इंपॉर्टेंट क्वेश्चन है। क्या हर
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क्रिमिनल केस डायरेक्टली सेशंस कोर्ट में
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जाता है? सिंपल आंसर है। नहीं कि
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प्रोसीडिंग कैसे इनिशिएट होती है? पहले
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कंप्लेंट के थ्रू।
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कोई भी व्यक्ति मैजिस्ट्रेट के सामने
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कंप्लेंट फाइल कर सकता है। मैजिस्ट्रेट
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कंप्लेंट और विटनेसेस को ओथ्स पर एग्जामिन
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करता है। अब आपके मन में एक सवाल आया होगा
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यह जरूरी क्यों है? ताकि फॉल्स कंप्लेंट
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फिल्टर आउट हो सके। अगर मैजिस्ट्रेट को
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लगता है कि सफिशिएंट ग्राउंड नहीं है तो
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कंप्लेंट डिसमिस की जा सकती है। दूसरा
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पुलिस रिपोर्ट के थ्रू। अब एक और सवाल
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कॉग्नजबल और नॉन कॉग्निजबल ऑफेंस में
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डिफरेंस क्या है और इस केसेस में पुलिस
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कैसे प्रोसीड करती है? कॉग्निजिबल ऑफेंस
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में पुलिस एफआईआर रजिस्टर करती है।
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इन्वेस्टिगेशन कंप्लीट होने के बाद
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चार्जशीट मैजिस्ट्रेट के सामने फाइल होता
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है। नॉन कॉग्निजिबल ऑफेंसेस में पुलिस को
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पहले मैजिस्ट्रेट की प्रायर परमिशन चाहिए।
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मैजिस्ट्रेट प्रीलिमिनरी इंक्वायरी कर
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सकता है और डिसाइड करता है कि प्रीमफिसाई
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केस बनता है या नहीं।
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अगर ऑफेंस एक्सक्लूसिवली ट्रायलेबल है तो
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केस सेशंस कोर्ट को कमिट कर दिया जाता है।
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अब हम सेशंस कोर्ट में ट्रायल का प्रोसीजर
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स्टेप बाय स्टेप समझते हैं। सबसे पहले
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ओपनिंग ऑफ द केस। ट्रायल की शुरुआत होती
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है। ट्रायल की शुरुआत पब्लिक प्रोसीक्यूटर
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के ओपनिंग स्टेटमेंट से होती है। चार्जेस
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का ब्रीफ एक्सप्लेनेशन किया जाता है और
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बताते हैं कि प्रोसीक्यूशन कौन से एविडेंस
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पे रिलाई करेगा। दूसरा है डिस्चार्ज
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एप्लीकेशन। अब एक क्वेश्चन आता है
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अक्यूज़्ड को ट्रायल से पहले कौन सा मेजर
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रिलीफ मिल सकता है? आंसर है डिस्चार्ज।
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अक्यूज केस कमिट होने के 60 दिन के अंदर
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डिस्चार्ज एप्लीकेशन फाइल कर सकता है।
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सेशंस जज पुलिस रिपोर्ट, डॉक्यूमेंट्स और
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दोनों पार्टीज की आर्गुममेंट सुनता है।
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अगर जज को लगता है कि ऑफेंस कमिट करने का
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सफिशिएंट ग्राउंड नहीं है तो अक्यूज़ को
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डिस्चार्ज किया जाता है और रीज़ंस रिकॉर्ड
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किए जाते हैं यह डिस्चार्ज के रिलेटेड। और
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अगर सफिशिएंस ग्राउंड है तो ट्रायल
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प्रोसीड करते हैं। तीसरा है फ्रेमिंग ऑफ
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चार्जेस। डिस्चार्ज डिनाई होने के बाद जज
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फॉर्मल चार्जेस फ्रेम करता है लिखित में।
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चार्जेस अक्यूज़्ड को फिजिकली या
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इलेक्ट्रॉनिकली एक्सप्लेन किए जाते हैं।
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अक्यूज़ से पूछा जाता है डू यू प्लीड
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गिल्टी और क्लेम ट्रायल?
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चार्जेस फर्स्ट हियरिंग ऑन चार्ज से 60
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दिन के अंदर फ्रेम होने चाहिए। अगर
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ऑफेंसेस सेशन कोर्ट में ट्रायलेबल नहीं है
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तो केस मैजिस्ट्रेट को ट्रांसफर हो सकता
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है। चौथा है प्लीड ऑफ़ गिल्टी। अगर
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अक्यूज्ड गिल्टी प्लीड करता है, जज प्ली
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को वर्बिटम रिकॉर्ड करता है। जज अपनी
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डिस्क्रेशन से कन्विक्शन कर सकता है या
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ट्रायल कंटिन्यू कर सकता है। जज को यह
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सेटिस्फाई करना होता है कि प्लीड वंटरी और
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इनफॉर्म्ड है। फिफ्थ है प्रोसीक्यूशन
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एविडेंस। अगर गिल्टी प्लीन नहीं होता,
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प्रोसीक्यूशन विटनेसेस एग्जामिन करता है।
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डॉक्यूमेंट्स और एविडेंस प्रोड्यूस करता
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है।
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और डिफेंस विटनेसेस को क्रॉस एग्जामिन
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करता है। जज क्रॉस एग्जामिनेशन डिफर कर
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सकता है या विटनेस को रिकॉल कर सकता है।
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अब छठा स्टेप है एग्जामिनेशन ऑफ द
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एक्यूज़्ड। प्रोसीक्यूशन एविडेंस के बाद
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अक्यूज़्ड को मौका दिया जाता है ताकि वह
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एविडेंस में आए सरकमस्ट्ससेस एक्सप्लेन कर
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सके। अब एक बहुत ही क्रूशियल पॉइंट है।
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अगर जज को लगता है कि कोई एविडेंस गिल्ट
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एस्टैब्लिश नहीं करता तो यहीं पर एक्यूटल
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हो सकता है। सेवंथ स्टेप है डिफेंस
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एविडेंस। अगर एक्यूटल नहीं होता
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डिफेंस एविडेंस लीड करता है।
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रिटन स्टेटमेंट फाइल करता है। डिफेंस
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विटनेसेस बुलाता है। कोर्ट प्रोसेस इशू
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करता है। जब तक एप्लीकेशन डेशियस ना हो।
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एट है फाइनल आर्गुमेंट्स। अब दोनों साइड्स
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प्रोसीक्यूशन और डिफेंस अपनी फाइनल
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आर्गुमेंट्स प्रेजेंट करते हैं। और लास्ट
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स्टेज है जजमेंट।
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सेशंस कोर्ट आर्गुमेंट्स कंक्लूड होने के
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30 दिन के अंदर मैक्सिमम 45 दिन रीज़ंस के
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साथ जजमेंट प्रोनाउंस करता है। जजमेंट रीज़
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होना चाहिए और 7 दिन के अंदर डिजिटली
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अपलोड होना चाहिए। अब जानते हैं प्रीवियस
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कन्विक्शन का रूल। एक छोटा सा सवाल। क्या
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अक्यूज़्ड का पास्ट रिकॉर्ड ट्रायल के
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दौरान देखा जाता है? सिंपल आंसर है। नहीं।
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अब ये क्यों? प्रीवियस कन्विक्शन का
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एविडेंस सिर्फ गिल्ट एस्टैब्लिश होने के
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बाद कंसीडर किया जाता है। ताकि अक्यूज़ के
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खिलाफ कोई प्रिजुडिस ना हो। अब बढ़ते हैं
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इंपॉर्टेंट प्रोविज़न की तरफ जो है ट्रायल
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एंड एब्सेंटिया व्हिच इज़ सेक्शन 356।
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अब अगर एक्यूज़्ड एस्कंड कर जाए मतलब भाग
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जाए तो क्या होता है? ऐसे केस में वारंट्स
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नोटिससेस के बाद चार्ज फ्रेमिंग के 90 दिन
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बाद ट्रायल प्रोसीड हो सकता है। अब बढ़ते
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हैं विक्टिम राइट्स की तरफ जो सेक्शन 193
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में कवर हुआ है। विक्टिम को इन्वेस्टिगेशन
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और ट्रायल की प्रोग्रेस हर 90 दिन में
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अपडेट देना मैंडेटरी है। और एक इंपॉर्टेंट
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प्रोविज़ है जो है फॉरेंसिक मैंडेट जो
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सेक्शन 176 के अंडर आता है। जहां ऑफेंस
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में 7 साल या उससे ज्यादा की पनिशमेंट है।
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यहां फॉरेंसिक एक्सपर्ट का विजिट मैंडेटरी
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है। बीएएनएसएस 2023 के अंडर ट्रायल बिफोर
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कोर्ट ऑफ़ सेशंस स्ट्रक्चरर्ड है, टाइम
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बाउंड है, अक्यूज़्ड और विक्टिम दोनों के
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राइट्स प्रोटेक्ट किए जाते हैं। अगर आप
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चाहते हैं कि मैं और ऐसे बीएएसएस के
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वीडियोस बनाऊं या बीएएनएसएस या सीआरपीसी
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के कंपैरिजन नोट्स बनाऊं या केस लॉ
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इंटीग्रेशन करूं तो कमेंट्स में जरूर
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लिखिए। वीडियो पसंद आया है तो लाइक, शेयर
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एंड सब्सक्राइब एंड कीप वाचिंग जस्ट बी
8:12
लॉजिकल।
#Legal
#Crime & Justice

