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आज का वीडियो सिर्फ एक हेडलाइन एक्सप्लेन
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करने के लिए नहीं है बल्कि एक बहुत ही
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इंपॉर्टेंट लीगल जजमेंट को ग्राउंड लेवल
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पर समझने के लिए है। आज हम बात करने वाले
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हैं केरला हाईकोर्ट के एक रीसेंट और
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लैंडमार्क डिसीजन पर जिसमें कोर्ट ने यह
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डिसाइड किया है कि क्या डॉक्टर प्रीफिक्स
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सिर्फ एमबीबीएस और मेडिकल डॉक्टर्स का
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एक्सक्लूसिव राइट है या फिर
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फिजियोथेरेपिस्ट और एलाइड हेल्थ केयर
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प्रोफेशनल्स भी अपने नाम के आगे डॉक्टर
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लिख सकते हैं। यह सवाल सिर्फ प्रोफेशन का
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नहीं है। यह सवाल पेशेंट सेफ्टी,
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प्रोफेशनल डिग्निटी और लॉ के लिमिट्स का
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है। इस जजमेंट के बाद डॉक्टर्स का एक
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सेक्शन नाराज है। फिजियोथेरेपिस्ट रिलीफ
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महसूस कर रहे हैं और आम पब्लिक कंफ्यूज हो
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सकती है। इसलिए इस वीडियो में हम पूरा केस
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दोनों साइड्स के आर्गुमेंट्स, कोर्ट के
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लीगल रीजनिंग और इसका रियल लाइफ इंपैक्ट
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समझेंगे सब कुछ डिटेल और क्लेरिटी के साथ।
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हेलो एवरीवन, दिस इज अ चौबे एंड वेलकम बैक
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टू अनदर एपिसोड ऑफ़ जस्पी लॉजिकल। वीडियो
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शुरू करने के पहले, मैं आपको बताना चाहती
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हूं कि कमर्शियन आपके लिए लॉ कोर्सेज लाया
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है अलग-अलग नीश के लिए। और आपके लिए लॉ
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क्यूरेटेड एग्जाम स्पेसिफिक नोट्स लाया
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है। अगर आपको यह कोर्सेज और नोट्स अवेल
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करने हैं, तो आप हमारी वेबसाइट पे क्वेरी
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ड्रॉप करके अवेल कर सकते हैं। या आप हमें
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WhatsApp पर डायरेक्टली मैसेज कर सकते
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हैं। वेबसाइट की लिंक और WhatsApp का नंबर
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डिस्क्रिप्शन में दिया है। जाइए जाके चेक
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आउट कीजिए। नाउ विदाउट एनी फर्दर अडू
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लेट्स गेट इंटू द वीडियो।
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केस के बैकग्राउंड को समझते हैं और यह
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समझते हैं यह मामला कोर्ट तक क्यों पहुंचा
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और कैसे पहुंचा। यह केस केरला हाई कोर्ट
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में फाइल किया गया इंडियन मेडिकल एसोसिएशन
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केरला स्टेट ब्रांच के द्वारा। आईएमए और
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कुछ सीनियर मेडिकल प्रैक्टिशनर्स ने कोर्ट
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से कहा फिजियोथरेपिस्ट अपने नाम के आगे
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डॉक्टर लिख रहे हैं जिससे आम पेशेंट्स को
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यह लगता है कि वो एक एमबीबीएस या मेडिकल
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डॉक्टर के पास जा रहे हैं। डॉक्टर्स का
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कंसर्न यह था इंडिया में मेडिकल अवेयरनेस
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अभी भी लिमिटेड है। स्पेशली रूलर और सेमी
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अर्बन एरियाज में पेशेंट डॉक्टर लिखा
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देखकर क्वालिफिकेशन चेक नहीं करता।
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डॉक्टर्स ने कोर्ट के सामने यह पॉइंट रखा।
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फिजियोथरेपिस्ट मेडिसिन प्रिस्राइब नहीं
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करते। सर्जरी नहीं करते, मेडिकल
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डायग्नोसिस का अथॉरिटी नहीं रखते। इसलिए
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अगर वह डॉक्टर प्रीफिक्स यूज करते हैं तो
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पेशेंट गलत एजमशंस बना सकते हैं।
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ट्रीटमेंट एक्सपेक्टेशंस मिसमैच हो सकती
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है और पेशेंट सेफ्टी कॉम्प्रोमाइज हो सकती
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है। आईएमए ने कोर्ट से कंप्लीट बैन की
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फिजियोथरेपिस्ट और उनका क्या कहना था यह
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जानते हैं। अब बात करते हैं दूसरे साइड
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की। फिजियोथरेपिस्ट और एलाइड हेल्थ केयर
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प्रोफेशनल्स ने कोर्ट के सामने बिल्कुल
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क्लियर स्टैंड लिया। उन्होंने कहा हम
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इललीगल या अनरेगुलेटेड प्रैक्टिशनर्स नहीं
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हैं। हम स्टटरी काउंसिल्स के अंडर
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रजिस्टर्ड है। हमारा प्रोफेशन
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पार्लियामेंट के एक्ट के थ्रू
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रिकॉग्नाइज्ड है। उन्होंने कोर्ट को बताया
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डॉक्टर शब्द सिर्फ फिजिशियन या सिनोनिम
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नहीं है। यह एकेडमिक और प्रोफेशनल टाइटल
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है। पीएचडी होल्डर्स, डेंटिस्ट्स, वेट्स
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भी डॉक्टर लिखते हैं। उनका कहना था अगर
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कोई लॉ स्पेसिफिकली मना नहीं करता तो
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सिर्फ प्रिस्रिप्शन के बेसिस पर हमारे
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राइट्स नहीं छीने जा सकते। उन्होंने यह भी
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कहा हम कभी भी यह क्लेम नहीं करते कि हम
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एमबीबीएस डॉक्टर्स हैं। हम अपना प्रोफेशन
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डिस्क्लोज करते हैं। पेशेंट को मिसलेड
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करना हमारा इंटेंशन नहीं होता। अब जानते
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हैं कोर्ट ने सबसे पहले क्या सवाल पूछा।
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जस्टिस वी अरुण ने जजमेंट लिखते हुए सबसे
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पहले एक फंडामेंटल लीगल क्वेश्चन
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आइडेंटिफाई किया। क्या कोई ऐसा स्टटरी
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प्रोविजन है जो डॉक्टर प्रीफिक्स के यूज़
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को सिर्फ मेडिकल डॉक्टर्स तक रिस्ट्रिक्ट
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करता हो? कोर्ट ने कहा अगर ऐसा कोई क्लियर
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लॉ नहीं होता तो कोर्ट रिस्ट्रिक्शन लगा
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सकती थी। लेकिन अगर ऐसा कोई लॉ नहीं है तो
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कोर्ट खुद से मोनोपोली क्रिएट नहीं कर
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सकती। यही इस पूरे केस का टर्निंग पॉइंट
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था। अब स्टटरी एनालिसिस की बात करते हैं।
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कोर्ट ने कानून क्या देखा? पहला नेशनल
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मेडिकल कमीशन एक्ट एनएमसी एक्ट। कोर्ट ने
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सबसे पहले एनएमसी एक्ट एग्जामिन किया।
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कोर्ट का ऑब्जरवेशन। यह एक्ट मेडिकल
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एजुकेशन और प्रैक्टिस रेगुलेट करता है।
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लेकिन कहीं भी यह नहीं लिखा है कि डॉक्टर
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प्रीफिक्स सिर्फ एमबीबीएस डॉक्टर्स के लिए
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रिजर्व होगा। कोर्ट ने क्लियरली कहा
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प्रैक्टिस रेगुलेट करना और टाइटल रेगुलेट
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करना दो अलग चीजें हैं। अब दूसरा केरला
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मेडिकल प्रैक्टिशनर्स एक्ट आईएमए ने इस
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एक्ट का सहारा लिया। कोर्ट ने कहा इस एक्ट
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का पर्पस फेक डॉक्टर्स और इललीगल मेडिकल
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प्रैक्टिस को रोकना है। यह एक्ट टाइटल
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मोनोपोली क्रिएट नहीं करता। तीसरा नेशनल
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कमीशन फॉर एलाइड एंड हेल्थ केयर
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प्रोफेशनल्स एक्ट 2021 यह जजमेंट का सबसे
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डिसाइसिव फैक्टर था। कोर्ट ने कहा
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पार्लियामेंट ने एलाइड हेल्थ केयर
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प्रोफेशनल्स को फॉर्मली रिकॉग्नाइज किया
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है। उनके लिए काउंसिल्स बनाई। रजिस्ट्रेशन
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और डिसिप्लिनरी फ्रेमवर्क दिया। कोर्ट का
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कंक्लूजन था जब लेजिस्लेचर किसी प्रोफेशन
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को रिकॉग्नाइज कर चुकी है तो कोर्ट बिना
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स्टचटरी प्रोहिबिशन के उनके प्रोफेशनल
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आइडेंटिटी पर रिस्ट्रिक्शन नहीं लगा सकती।
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अब डॉक्टर शब्द के अर्थ को समझते हैं एंड
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कोर्ट का हिस्टोरिकल व्यू जानते हैं।
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कोर्ट ने जजमेंट में हिस्ट्री का रेफरेंस
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दिया। जस्टिस वी अरुण ने लिखा डॉक्टर
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लैटिन शब्द डॉकरी से आया है जिसका मतलब
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होता है टीच करना या ज्ञान देना। कोर्ट ने
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कहा हर डॉक्टर फिजिशियन नहीं होता लेकिन
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हर फिजिशियन डॉक्टर हो सकता है। इसलिए
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डॉक्टर शब्द को सिर्फ मेडिसिन तक लिमिटेड
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करना हिस्टोरिकली और लीगली गलत है। अब
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पेशेंट कन्फ्यूजन पर कोर्ट का क्या स्टैंड
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था? यह जानते हैं। कोर्ट ने डॉक्टर्स के
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कंसर्न को डिसमिस नहीं किया। कोर्ट ने
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माना पेशेंट कंफ्यूजन एक रियल इशू है।
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पब्लिक इंटरेस्ट सबसे इंपॉर्टेंट है।
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लेकिन कोर्ट ने यह भी कहा कंफ्यूजन का
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स्यूशन एब्सोल्यूट प्रोहिबिशन नहीं हो
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सकता जब तक लॉ अलऊ करता हो। कोर्ट का
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अप्रोच था ट्रांसपेरेंसी प्रॉपर
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डिस्क्लोज़र क्वालिफिकेशन मेंशन करना जैसे
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डॉक्टर एक्स फिजियोथरेपिस्ट
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डॉक्टर वाई पीटी। अब केरला हाई कोर्ट के
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फाइनल वर्डिक्ट को समझते हैं। कोर्ट ने
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अपने फाइनल वर्डिक्ट देते हुए कहा, डॉक्टर
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प्रीफिक्स मेडिकल डॉक्टर्स का एक्सक्लूसिव
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राइट नहीं है। फिजियोथरेपिस्ट पर ब्लैंकेट
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बैन इललीगल होगा। कोर्ट बिना लेजिसलेटिव
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बैकिंग के रिस्ट्रिक्शंस इंपोज नहीं
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करेगी। आईएमए की सभी पिटीशंस डिसमिस की
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जाती है। अब इस जजमेंट का देश भर पर क्या
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असर होगा यह समझते हैं। यह जजमेंट सिर्फ
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केरला तक लिमिटेड नहीं है। इसका इंपैक्ट
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पैन इंडिया, प्रोफेशनल डिबेट्स, रेगुलेटरी
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क्लेरिटी, एलाइड हेल्थ प्रोफेशनल्स का
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लीगल कॉन्फिडेंस भी बनेगा। लेकिन कोर्ट ने
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क्लियर किया यह जजमेंट किसी को मेडिकल
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प्रैक्टिस का अधिकार नहीं देता। स्कोप ऑफ
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प्रैक्टिस स्ट्रिक्टली लॉ के अंडर ही
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रहेगा। अब कोर्ट के कंक्लूसिव मैसेज को
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समझते हैं। कोर्ट का मैसेज बिल्कुल क्लियर
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है। कानून के बिना मोनोपोली नहीं बन सकती।
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प्रोफेशनल डिग्निटी इंपॉर्टेंट है। पेशेंट
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क्लेरिटी सबसे ऊपर है और कंफ्यूजन का
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स्यूशन अवेयरनेस है बैन नहीं। आपका इस
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जजमेंट पर क्या ओपिनियन है? कमेंट्स में
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बताइए। जरूर लिखिए। क्या डॉक्टर सिर्फ
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एमबीबीएस डॉक्टर्स के लिए होना चाहिए या
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सब प्रोफेशनल्स के लिए अलाउड होना चाहिए।
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अगर आपको यह वीडियो इनफेटिव लगा हो, लाइक
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करें, शेयर करें, सब्सक्राइब करें। मिलते
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हैं नेक्स्ट वीडियो में। अनंटिल देन कीप