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आज हम बात करने जा रहे हैं झारखंड हाई
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कोर्ट के एक ऐसे जजमेंट की जो देखने में
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एक डिवोर्स केस लग सकता है। लेकिन असल में
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यह इंडिया के फैमिली लॉ और डिजिटल राइट्स
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के फ्यूचर को रिीडफाइन करता है। यह फैसला
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सिर्फ यह नहीं कहता है कि वाइफ को डिवोर्स
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मिलना चाहिए। बल्कि यह कहता है कि शादी के
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नाम पर किसी की प्राइवेसी तोड़ना, उसके
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पर्सनल फोटो का मिसयज करना और उसके पास्ट
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को लेकर उसे जलील करना यह सब सीवियर मेंटल
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क्रुलिटी है। और यह बात कोर्ट ने बहुत
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क्लियरली और फर्मली कही है। हेलो एवरीवन,
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दिस इज अ चौबे एंड वेलकम बैक टू अनदर
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एपिसोड ऑफ़ जस्ट बी लॉजिकल। वीडियो शुरू
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करने के पहले मैं आपको बताना चाहती हूं कि
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कमर्स यन आपके लिए लॉ कोर्सेज लाया है
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अलग-अलग नीश के लिए और आपके लिए लॉ
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क्यूरेटेड एग्जाम पॉइंट ऑफ व्यू से या फिर
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अगर आपको लॉ नोट्स आपके कॉलेज के
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कस्टमाइज्ड चाहिए तो आप यह सारी चीजें
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हमारे कमर्शियल वेबसाइट से एक्सेस कर सकते
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हैं एक क्वेरी ड्रॉप करके या फिर आप हमें
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WhatsApp मैसेज कर सकते हैं या एक ईमेल
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ड्रॉप कर सकते हैं। वेबसाइट के लिंक, फोन
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नंबर और ईमेल आईडी आपको डिस्क्रिप्शन में
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मिल जाएंगे। जल्दी जाइए, चेक आउट करिए।
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नाउ विदाउट एनी फर्दर अडू लेट्स गेट इनू द
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केस के बैकग्राउंड को जानते हैं। इस केस
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में झारखंड हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच
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जिसमें जस्टिस सुजित नारायण प्रसाद और
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जस्टिस अरुण कुमार राय शामिल थे। ने एक
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महिला को डिवोर्स ग्रांट किया। फैक्ट्स
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बिल्कुल क्लियर थे। हस्बैंड ने वाइफ का
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मोबाइल फोन बिना कंसेंट एक्सेस किया। उसके
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Google ड्राइव से पर्सनल फोटोग्राफ्स
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निकाले। यह फोटोग्राफ्स फैमिली मेंबर्स के
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साथ शेयर किए। फोटोग्राफ्स वाइफ के
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प्रीमैरिज रिलेशनशिप से रिलेटेड थे। इसके
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बाद वाइफ को लगातार ह्यूमिलिएशन, शेमिंग
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और कैरेक्टर अससिनेशन का सामना करना पड़ा।
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कोर्ट ने कहा यह कोई नॉर्मल मैट्रिमोनियल
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डिस्कर्ड नहीं है। यह डेलीबेट मेंटल
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शादी में डिजिटल प्राइवेसी का महत्व जानते
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हैं। इस जजमेंट का सबसे पावरफुल एस्पेक्ट
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है डिजिटल प्राइवेसी विद इन मैरिज। यस।
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कोर्ट ने इंप्लसिटली एक्सेप्ट किया है कि
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शादी का मतलब यह नहीं होता कि स्पाउस
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दूसरे के फोन, डाटा और पर्सनल लाइफ का
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मालिक बन जाए। यह अप्रोच इंटरनेशनल लीगल
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थिंकिंग के बिल्कुल अलाइंड है। ग्लोबली
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यूरोप में आर्टिकल एट ऑफ द यूरोपियन
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कन्वेंशन ऑन ह्यूमन राइट्स के अंडर
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प्राइवेट लाइफ और पर्सनल डाटा शादी के बाद
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भी प्रोटेक्टेड रहता है। यूके, कनाडा और
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ऑस्ट्रेलिया जैसे जुरिसडिक्शन में
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अनऑथराइज्ड फोन एक्सेस और प्राइवेट
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मैसेजेस का मिसयूज कोर्सिव बिहेवियर और
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अब्यूसिव माना जा रहा है। झारखंड हाईकोर्ट
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ने इस कंडक्ट को मेंटल क्रुलिटी के
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फ्रेमवर्क में रखकर इंडियन फैमिली लॉ को
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मॉडर्न डिजिटल रियलिटी के साथ सिंक कर
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मेंटल क्रुलिटी सिर्फ फिजिकल वायलेंस नहीं
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है। कोर्ट ने सेक्शन 131 आईए ऑफ द हिंदू
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मैरिज एक्ट को एक्सप्लेन करते हुए एक बहुत
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इंपॉर्टेंट बात कही है। क्रुलिटी सिर्फ
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मारपीट या बॉटली हार्म तक लिमिटेड नहीं
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है। बेंच ने क्लियर किया
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कि साइकोलॉजिकल ट्रॉमा पब्लिक ह्यूमिलिएशन
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ट्रस्ट का सिस्टमैटिक डिस्ट्रक्शन इमोशनल
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सफरिंग है। यह सब मेंटल क्रलिटी की
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कैटेगरी में आते हैं। यह अप्रोच कंपैरेटिव
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फैमिली लॉ के बिल्कुल पैरेलल है। यूके
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कोर्ट्स इमोशनल अब्यूज ऑफ कोर्स कंट्रोल
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को डिवोर्स का वैलिड बेसिस मानते हैं।
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इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स लॉ एस्पेशली
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कहता है कि वायलेंस अगेंस्ट वुमेन मेंटल
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सफरिंग भी शामिल है। यह जजमेंट एक मैच्योर
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जुडिशियल शिफ्ट को शो करता है। इस केस के
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सबसे सेंसिटिव और प्रोग्रेसिव एलिमेंट को
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जानते हैं। वुमेन के पास्ट रिलेशनशिप पर
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कोर्ट का स्टैंड कोर्ट ने बिल्कुल
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क्लियरली कहा प्रीमैरिज रिलेशनशिप उससे
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अनरिलेटेड कंसेंशियल फोटोग्राफ्स शादी के
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बाद वेपनाइज करना कैरेक्टर अससिनेशन है।
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कोई लेजिटमेट मैरिटल ग्रिवेंस नहीं।
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इंटरनेशनलली भी यह प्रिंसिपल सेटल्ड है।
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इंग्लैंड और वेल्स में पास्ट सेक्सुअल
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हिस्ट्री लीगली इरिलेवेंट होती है। मैरिज
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के अंडर मोरल पुलिसिंग को कोर्ट्स डिरेज
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करते हैं। झारखंड हाई कोर्ट ने
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इनडायरेक्टली यह मैसेज दिया एक औरत की
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डिग्निटी और ऑटोनोमी शादी के बाद डिॉल्व
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यह डिसीजन कॉन्स्टिट्यूशनल वैल्यू,
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डिग्निटी, इक्वलिटी और प्राइवेसी को
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ट्रस्ट एक इमोशनल नहीं लीगल कांसेप्ट है।
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कोर्ट ने एक बहुत स्ट्रांग ऑब्जरवेशन की।
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जब ट्रस्ट एक बार टूट जाता है तो मैरिटल
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बॉन्ड लीगली और इमोशनली रिपेयरेबल नहीं
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यह सिर्फ फिलॉसफिकल स्टेटमेंट नहीं है। यह
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लीगल रीजनिंग है। कंपैरेटिव जुरिस
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प्रिडेंस में ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के
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कोर्ट्स ट्रस्ट के इररिवर्सिबल ब्रेकडाउन
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को मैरिज के एंड का वैलिड इंडिकेटर मानते
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हैं। झारखंड हाई कोर्ट ने ट्रस्ट को लीगल
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थ्रेशहोल्ड के रूप में ट्रीट किया। इसका
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मतलब यह है मैरिज सर्विलेंस लाइसेंस नहीं
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है ना ही डोमिनेशन का टोल। अब इंटरनेशनल
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ह्यूमन राइट्स और इंडिया की इमेज की बात
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करते हैं। इस तरह के जजमेंट्स का इंपैक्ट
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सिर्फ डोमेस्टिक नहीं होता। इंडिया को
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रेगुलरली वुमस राइट्स, डिजिटल प्राइवेसी,
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एक्सेस टू जस्टिस के कॉन्टेक्स्ट में
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इंटरनेशनल फोरम्स पर एक्सेस किया जाता है।
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जब इंडियन कोर्ट्स साइकोलॉजिकल अब्यूज,
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डिजिटल शेमिंग, टेक्नोलॉजिकली ड्रिवन
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क्रलिटी को रिकॉग्नाइज करते हैं तो इंडिया
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का जुडिशियल सिस्टम ग्लोबली क्रेडिबल और
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कंटेंपरेरी दिखाई देता है।
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स्पेशली आज के टाइम में जब डिजिटल एविडेंस
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और ऑनलाइन हरासमेंट क्रॉस बॉर्डर
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मैट्रिमोनियल डिस्प्यूट्स में कॉमन हो
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झारखंड हाईकोर्ट का यह फैसला शायद
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हेडलाइंस में लाउड ना हो लेकिन इसका
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इंपैक्ट डीप और लास्टिंग है। यह जजमेंट
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याद दिलाता है शादी डिग्निटी के खिलाफ
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शील्ड नहीं बन सकती। प्राइवेसी वायलेशन,
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ह्यूमिलिएशन और इमोशनल वायलेशन के लिए
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ट्रस्ट, रिस्पेक्ट और ऑटोनोमी सिर्फ मोरल
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वैल्यूस नहीं है। यह एनफोर्सिएबल लीगल
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स्टैंडर्ड्स है इंडिया में भी और ग्लोबली
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भी। अगर आपको यह एनालिसिस पसंद आया हो तो
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वीडियो को लाइक करें, शेयर करें और चैनल
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