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आज हम बात करने जा रहे हैं एक बहुत ही
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महत्वपूर्ण और दूरगमी कानून बदलाव के बारे
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में। सिक्योरिटीज मार्केट कोड 2025 यह कोड
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सिर्फ एक नया लॉ नहीं है बल्कि यह दिखाता
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है कि भारत अपने कैपिटल मार्केट्स को
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ग्लोबल लेवल पर कैसे पोजीशन करना चाहता
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है। हेलो एवरीवन, दिस इज अ चौबे एंड वेलकम
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बैक टू अनदर एपिसोड ऑफ़ चेस लॉज पे। वीडियो
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शुरू करने के पहले मैं आपको बताना चाहती
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हूं कि कमर्शियन आपके लिए अलग-अलग लॉ
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कोर्सेज लाया है अलग-अलग नीश के लिए और
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आपके लिए लॉ क्यूरेटेड नोट्स भी लाया है।
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अगर आपको यह लॉ कोर्सेस और नोट्स एक्सेस
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करने हैं तो आप हमारे वेबसाइट से एक्सेस
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कर सकते हैं एक क्वेरी ड्रॉप करके या आप
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हमें डायरेक्टली WhatsApp पर मैसेज कर
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सकते हैं। वेबसाइट की लिंक और WhatsApp
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नंबर डिस्क्रिप्शन में दी है। जाइए और
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जाके चेक आउट कीजिए। नाउ विदाउट एनी फर्दर
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अडू लेट्स गेट इनू द वीडियो।
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जानते हैं सिक्योरिटीज मार्केट कोड क्या
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है? दिसंबर 2025 में भारत सरकार ने
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सिक्योरिटीज मार्केट कोड 2025 को
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पार्लियामेंट में इंट्रोड्यूस किया। इस
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कोड का सबसे बड़ा ऑब्जेक्टिव है मल्टीपल
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सिक्योरिटीज लॉ को एक सिंगल यूनिफॉर्म्ड
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फ्रेमवर्क में लाना। इससे पहले इंडियन
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सिक्योरिटीज मार्केट को अलग-अलग कानून
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रेगुलेट करते थे। जैसे कि सिक्योरिटीज
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कॉन्ट्रैक्ट रेगुलेशन एक्ट 1956, एसईबीआई
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एक्ट 1992, रिपॉजिटरी एक्ट्स 1996।
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अब इन सभी कानून को एक ही कोड के अंदर
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कंसोलिडेट कर दिया गया है ताकि रेगुलेशन
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ज्यादा सिंपल, मॉडर्न और कंसिस्टेंट हो
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सके। अब जानते हैं यह कोड जरूरी क्यों है?
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सिक्योरिटीज मार्केट कोड 2025 को इंडिया
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का फाइनेंशियल लीगल सिस्टम का सबसे बड़ा
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रिफॉर्म माना जा रहा है। एससीबीआई के
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फॉर्मुलेशन के बाद। इस कोड के कुछ मुख्य
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ऑब्जेक्टिव्स हैं। जैसे कि सिक्योरिटीज लॉ
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को सिंपलीफाई करना, कंप्लायंस
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कॉम्प्लेक्सिटी कम करना, इन्वेस्टर्स के
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लिए लीगल क्लेरिटी बढ़ाना, इंडिया के
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कैपिटल मार्केट्स को ग्लोबली कंपेटिटिव
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बनाना। यह कोड एक स्ट्रांग सिग्नल देता है
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कि भारत अपने फाइनेंसियल रेगुलेशंस को
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इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स के साथ अलाइन करना
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चाहता है। इस कोड के इंटरनेशनल इंपैक्ट को
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जानते हैं। ग्लोबल पर्सपेक्टिव से देखा
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जाए तो यह कोड सिर्फ डोमेस्टिक रिफॉर्म
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नहीं है। यह भारत की रेगुलेटरी इंटेंट को
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ग्लोबल फाइनेंशियल एंबिशन को रिफ्लेक्ट
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करता है। फॉरेन इन्वेस्टर्स के लिए यह
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कंसोलिडेटेड लॉ का मतलब होता है कि रूल्स
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को समझना आसान है। लीगल प्रेडिक्टिबिलिटी
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ज्यादा है और रेगुलेटरी ओवरलैप कम। लेकिन
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साथ ही एक्सपेंडेड रेगुलेटरी पावर्स का
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मतलब यह भी है कि चेकक्स एंड बैलेंससेस पर
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अब इस कोड के की फीचर्स को जानते हैं।
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एसईबीआई के बढ़े हुए पावर्स। इस कोड के
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जरिए एसईबीआई के रेगुलेटरी, इन्वेस्टिगेशन
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और एनफोर्समेंट पावर्स को काफी बढ़ा दिया
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गया है। लेकिन इंटरनेशनल बेस्ट
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प्रैक्टिसेस के कंपैरिजन में कोड में
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प्रोसीजरल सेफगार्ड्स और अकाउंटेबिलिटी
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मैकेनिज्म्स को ज्यादा क्लियरली डिफाइन
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नहीं किया गया। जो एक कंसर्न हो सकता है।
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दूसरा है 8 साल की इन्वेस्टिगेशन
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कोड एक इंपॉर्टेंट प्रोविजन इंट्रोड्यूस
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करता है। 8 साल की आउटर लिमिट फॉर
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इंस्पेक्शंस और इन्वेस्टिगेशंस। यह
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प्रोविजन ग्लोबल ड्यू प्रोसेस स्टैंडर्ड्स
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के साथ अलाइन करता है। लेकिन कोड में
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एक्सेप्शनंस भी दिए गए हैं। जैसे
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सिस्टमैटिक मार्केट इंपैक्ट के केसेस जहां
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इन्वेस्टिगेशन इस लिमिट के बाद भी
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कंटिन्यू हो सकती है। थर्ड है
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डी्रिमिनलाइजेशन और हायर पेनल्टीज। एक
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पॉजिटिव रिफॉर्म यह भी है कि माइनर
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प्रोसीजरल वायलेशंस को डी्रिमिनलाइज किया
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गया है। अब ऐसे केसेस में जेल के बजाय
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सिविल पेनल्टीज लगेगी।
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लेकिन साथ ही पेनल्टी लिमिट्स को काफी
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इनक्रीस किया गया है। कुछ केसेस में 100
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करोड़ तक। इंटरनेशनल इन्वेस्टर्स के लिए
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यह प्रोपोशनैलिटी का एक सवाल खड़ा कर सकता
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है। चौथा है अजुडिकेशन पावर्स।
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एजुडिकेटिंग ऑफिसर्स को अब पावर्स दी गई
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है। जैसे डिस्कर्जमेंट, रेस्टट्यूशन, सीज
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एंड डिसीज्ड ऑर्डर्स। यह सब स्ट्रांग
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एनफोर्समेंट टूल्स है। लेकिन अगर
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प्रोसीजरल क्लेरिटी ना हो तो रेगुलेटरी
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ओवर रीच का रिस्क भी होता है। अब अपीलेट
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ओवरसाइट की बात करते हैं। हिस्टोरिकली
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सिक्योरिटीज अपीलेट ट्राइबनल एसईबीआई के
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डिसीजंस पर जुडिशियल ओवरसाइड प्रोवाइड
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करता रहा है। लेकिन नए कोर्ट में इस
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ट्राइबनल के इंस्टीट्यूशनल रोल को
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एक्सप्लसिटली स्ट्रेंथन नहीं किया गया। जो
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ग्लोबल इन्वेस्टर्स के लिए एक कंसर्न हो
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सकता है क्योंकि अपीलेट रेमेडीज रेगुलेटरी
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कॉन्फिडेंस का एक की एलिमेंट होती है। अब
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ग्लोबल हार्मोनाइजेशन वर्सेस
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इंप्लीमेंटेशन की बात करते हैं।
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सिक्योरिटीज मार्केट कोड क्लियरली ग्लोबल
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रेगुलेटरी मॉडल से इंस्पिरेशन लेता है।
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जैसे यूएस, यूके और ईयू फ्रेमवक्स। लेकिन
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सिर्फ लॉ बनाना काफी नहीं होता। असली
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टेस्ट होता है एनफोर्समेंट का अप्रोच।
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रेगुलेटरी कंसिस्टेंसी और डिसीजन मेकिंग
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ट्रांसपेरेंसी। यह फ़ैक्टर्स डिसाइड करेंगे
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कि ग्लोबल कैपिटल इंडिया पर कितना भरोसा
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करता है। अब हम इसके जियोपॉलिटिकल
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कॉन्टेक्स्ट की बात करते हैं। आज के समय
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में कैपिटल मार्केट्स सिर्फ इकोनॉमिक नहीं
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बल्कि जियोपॉलिटिकल टूल्स भी बन चुके हैं।
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भारत चाहता है कि वो एक रिलायबल और
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प्रेडिक्टेबल कैपिटल मार्केट डेस्टिनेशन
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बने। खासकर जब दुनिया का एक ट्रेडिशनल
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फाइनशियल हब पर जियोपॉलिटिकल प्रेशर बढ़
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रहा है। इस कॉन्टेक्स्ट में एक यूनिफाइड
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सिक्योरिटीज लॉ इंडिया के स्ट्रेटेजिक
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पोजीशनिंग को स्ट्रेंथन करता है। अब इसके
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की टेक अवेज़ को जानते हैं। अगर हम समराइज
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करें तो सिक्योरिटीज मार्केट कोड 2025 एक
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लैंडमार्क रिफॉर्म है। यह इंडिया के
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कैपिटल मार्केट्स को मॉडर्न बनाता है।
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रेगुलेटरी पावर्स बढ़ाता है लेकिन
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अकाउंटेबिलिटी पर सवाल भी उठाता है और
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ग्लोबल एलाइनमेंट का अटेमप्ट करता है
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लेकिन इंप्लीमेंटेशन डिसाइसिव होगा। अब
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जानते हैं इंडिया के कैपिटल मार्केट्स का
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फ्यूचर। ग्लोबल इन्वेस्टर्स और पॉलिसी
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मेकर्स के लिए सिक्योरिटीज मार्केट कोड
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2025 एक टेस्ट केस है कि क्या भारत एक
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ट्रांसपेरेंट प्रेडिक्टेबल और ग्लोबली
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ट्रस्टेड कैपिटल मार्केट जुरिसडिक्शन बना
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पाता है या नहीं। अगर आपको यह एनालिसिस
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यूज़फुल लगा तो वीडियो को लाइक करें, शेयर
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