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दोस्तों, उमर खालिद का केस सिर्फ एक बेल
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एप्लीकेशन का केस नहीं है। यह तीन बहुत
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बड़े सवालों को टच करता है। पहला भारत में
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पर्सनल लिबर्टी का स्कोप क्या है? जब
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यूएपीए जैसे कानून लगते हैं? दूसरा बेल और
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जेल का कॉन्स्टिट्यूशनल प्रिंसिपल एंटी
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टेरर लॉस के सामने कितना सर्वाइव करता है?
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और तीसरा क्या स्पीच, प्रोटेस्ट और डिसेंट
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को कास्परेसी के फ्रेमवर्क में डाला जा
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सकता है? इसलिए सुप्रीम कोर्ट का यह
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जजमेंट सिर्फ उमर खालिद के लिए नहीं बल्कि
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पूरे क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के लिए एक
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डायरेक्शन सेटिंग जजमेंट माना जा सकता है।
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हेलो एवरीवन, दिस इज अ चौबे एंड वेलकम बैक
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टू अ न्यू एपिसोड ऑफ़ चेसबी लॉजिकल। वीडियो
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शुरू करने के पहले मैं आपको बताना चाहती
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हूं कि कमर्सन आपके लिए लॉ कोर्सेज लाया
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है और एग्जाम क्यूरेटेड नोट्स लाया है
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जिसको आप कमर्सन की वेबसाइट से एक्सेस कर
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सकते हैं कमर्सन के क्वेरी सेक्शन में
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आपका क्वेरी ड्रॉप करके
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कमर्सन का लिंक डिस्क्रिप्शन में दिया है
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और जल्दी जाइए और चेक आउट कीजिए। नाउ
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विदाउट एनी फर्दर अडू लेट्स गेट इनू द
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इस केस की हिस्ट्री जानते हैं। फरवरी 2020
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में दिल्ली में सीएए के अगेंस्ट प्रोटेस्ट
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हो रहा था जो था सिटीजनशिप अमेंडमेंट
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एक्ट। इस प्रोटेस्ट को रायट में बदलने में
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समय नहीं लगा। बट इस रायट को लार्जर
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कॉनस्परेसी कहा गया। अब जानते हैं दिल्ली
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रायट केस को लार्जर कॉनस्परेसी क्यों कहा
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गया? दिल्ली राइट्स के बाद पुलिस ने जो
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नरेटिव अडॉप किया उसका कोर कांसेप्ट था
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लार्जर कॉनस्परेसी। इसका मतलब यह है कि
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वायलेंस सिर्फ ग्राउंड पर हुई स्पॉनटेनियस
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लड़ाई नहीं थी बल्कि इसके पीछे प्लानिंग,
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कोऑर्डिनेशन और मोबिलाइजेशन था। और यह
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मोबिलाइजेशन एलिजिडली स्पीचेस, मीटिंग्स,
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कम्युनिकेशन के जरिए हुआ।
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यहीं पर उमर खालिद जैसे लोग प्रोसीक्यूशन
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के रेडार में आए क्योंकि पुलिस ने यह कहा
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कि लीडरशिप लेवल पर कुछ लोगों ने
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आइडियोलॉजिकल और ऑर्गेनाइजेशनल रोल प्ले
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किया। कॉनस्परेसी लॉ में डायरेक्ट वलेशन
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जरूरी नहीं होता। अगर प्लानिंग और इंटेंट
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एस्टैब्लिश हो जाए तो कॉनस्परेसी बन सकती
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है। अब जानते हैं यूएपीए क्या है और यह
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बेल को इतना डिफिकल्ट क्यों बनाता है। अब
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समझना जरूरी है कि यूएपीए नॉर्मल क्रिमिनल
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लॉ से अलग क्यों है। यूएपीए का सेक्शन 43
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डी5 कहता है अगर कोर्ट को प्रेमफेसाई लगता
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है कि अक्यूज़ के खिलाफ एलगेशंस सच हो सकते
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हैं तो बेल नहीं दी जा सकती है। यानी
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कोर्ट एविडेंस को पूरी तरह टेस्ट नहीं
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करता। क्रॉस एग्जामिनेशन नहीं होता। सिर्फ
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यह देखा जाता है कि प्रोसीक्यूशन का वर्जन
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पॉसिबल लगता है या नहीं। इसी वजह से
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यूएपीए में बेल एक एक्सेप्शन बन जाती है।
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अब कॉन्स्टिट्यूशनल टेंशन क्या है? यहां
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पर आर्टिकल 21 राइट टू लाइफ एंड लिबर्टी
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और यूएपीए के बीच डायरेक्ट क्लैश होता है।
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आपके मन में एक सवाल होगा। उमर खालिद पे
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प्रोसीक्यूशन का केस क्या था?
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प्रोसीक्यूशन ने सुप्रीम कोर्ट के सामने
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ब्रॉडली यह कहा उमर खालिद एक आइसोलेटेड
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प्रोटेस्टर नहीं थे। उनके रोल एलिजिडली
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कास्परेसी या आइडियोलॉजिकल और कोऑर्डिनेशन
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चार्जशीट में उनके एलिज स्पीचेस, मीटिंग्स
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और कम्युनिकेशन का जिक्र है। यह सब चीजें
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क्यूम्युलेटिव इफेक्ट में देखी जानी
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चाहिए। अलग-अलग नहीं। कोर्ट ने बार-बार यह
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कहा कि बेल स्टेज पर एविडेंस का फाइनल
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ट्रुथ टेस्ट नहीं होता। अब इंपॉर्टेंट
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लीगल पॉइंट यह है। कोर्ट ने यह नहीं कहा
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कि उमर खालिद दोषी है। सिर्फ यह कहा कि
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एलगेशंस इतने सीरियस है कि ट्रायल से पहले
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डिफेंस की सबसे स्ट्रांग कॉन्स्टिट्यूशनल
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आर्गुमेंट्स ये थे। डिफेंस का सबसे
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स्ट्रांग पिलर था आर्टिकल 21। उन्होंने
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कहा लगभग 5 साल से जेल में रहना पनिशमेंट
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के बराबर है। ट्रायल अभी शुरू भी नहीं
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हुआ। स्पीच और डिसेंट को टेररिज्म के लेंथ
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से देखना डेंजरस प्रेसिडेंट होगा।
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डेमोक्रेसी में प्रोटेस्ट क्रिमिनल
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कॉनस्परेसी नहीं बन सकता।
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डिफेंस ने यह भी कहा कि बेल इज द रूल एंड
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जेल इज द एक्सेप्शन। यह प्रिंसिपल सुप्रीम
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कोर्ट ने कई केसेस में माना है। बट
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह प्रिंसिपल
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ऑर्डिनरीली क्रिमिनल लॉ में अप्लाई होता
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है। यूएपीए में नहीं। अब जानते हैं
4:46
सुप्रीम कोर्ट का क्या कहना था। कोर्ट ने
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जजमेंट में एक बहुत ही इंपॉर्टेंट फ्रेज
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यूज किया जो है क्वालिटेटिवली डिफरेंट
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फुटिंग। इसका मतलब है उमर खालिद और शजील
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इमाम का एलिजिड रोल था। बाकी अक्यूज़्ड के
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मुकाबले ज्यादा एसेंश्रल और इन्फ्लुएंशियल
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बताया गया। इसी वजह से कोर्ट ने उन्हें
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सेम ट्रीटमेंट देने से इंकार किया।
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यही वजह है कि पांच कोऑक्यूज़्ड को बेल
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मिली। लेकिन उमर खालिद और शजील इमाम को
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नहीं। इसमें एक इंपॉर्टेंट लीगल
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डॉक्ट्राइन है। इक्वलिटी का मतलब
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आइडेंटिकल ट्रीटमेंट नहीं होता बल्कि
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इक्वल ट्रीटमेंट अमंग इक्वल्स होता है। अब
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जानते हैं डिले स्पीडी ट्रायल और सुप्रीम
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कोर्ट का क्या स्टैंड था?
5:34
एक बहुत सेंसिटिव सवाल था। क्या ट्रायल
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में डिले बेल का ग्राउंड बन सकता है?
5:40
सुप्रीम कोर्ट का जवाब यह था कि डिले एक
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रेलेवेंट फैक्टर हो सकता है। लेकिन यूएपीए
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के केसेस में डिले ऑटोमेटिक बेल का राइट
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नहीं देता। जब ऑफेंसेस पब्लिक ऑर्डर और
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सिक्योरिटी से जुड़ा हो। कोर्ट ने यह भी
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कहा कि ट्रायल को फास्ट ट्रैक करना जरूरी
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है। लेकिन बेल का डिसीजन स्टरी लिमिट्स के
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अंडर ही होगा। अब क्रिटिकल ऑब्जरवेशन यह
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है इस पॉइंट पर सिविल लिबर्टीज ग्रुप्स
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कोर्ट से डिसए्री करते हैं। लेकिन कोर्ट्स
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का फोकस स्टचटरी डिसिप्लिन पर था।
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सुप्रीम कोर्ट ने वन ईयर का बार भी लगाया
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है कि उमर खालिद और शजील इमाम एक साल तक
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बेल के लिए अप्लाई नहीं कर सकते। अब जानते
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हैं वन ईयर बाद क्यों और कितना अनयूजुअल
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है। सुप्रीम कोर्ट का सबसे अनयूजुअल स्टेप
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था एक साल तक नई बेल एप्लीकेशन पर रोक।
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कोर्ट का लॉजिक बार-बार सेम आर्गुमेंट्स
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के साथ बेल पिटीशंस फाइल करना जुडिशियल
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प्रोसेस को बर्डन करता है। जब तक
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सरकमस्ट्ससेस सब्सटैंशियली चेंज ना हो,
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रिपीटेड बेल प्लीज अवॉइड होनी चाहिए। यह
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स्टेप रेयर है लेकिन कोर्ट ने इसे
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प्रोसीजरल डिसिप्लिन के रूप में जस्टिफाई
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इस जजमेंट का लॉन्ग टर्म इंपैक्ट क्या है?
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इस जजमेंट के कुछ लॉन्ग टर्म इंप्लिकेशंस
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है। जैसे यूएपीए बेल जुरिस्प्रिडेंस और
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ज्यादा प्रोसीक्यूशन फ्रेंडली हो गई।
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प्रमफसाइज स्टेज पर ही अक्यूज्ड के लिए
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अपहिल बैटल बन जाती है। स्पीच बेस्ड
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एलगेशंस को भी कॉनस्परेसी फ्रेमवर्क में
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देखने का ट्रेंड स्ट्रांग होता है। ट्रायल
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डिले पर कोर्ट्स फ्यूचर में भी कंजर्वेटिव
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अप्रोच ले सकता है। इसी वजह से यह जजमेंट
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सिर्फ एक केस नहीं बल्कि एक
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कॉन्स्टिट्यूशनल डिबेट का माइलस्टोन है।
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तो सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि उमर
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खालिद दोषी है। कोर्ट ने सिर्फ यह कहा कि
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यूएपीए का फ्रेमवर्क के अंदर प्रोसीक्यूशन
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का प्रमोफसाई केस स्ट्रांग है। इसलिए बेल
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देना कानूनी रूप से पॉसिबल नहीं है। यह
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जजमेंट लिबर्टी वर्सेस सिक्योरिटी के
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कॉन्फ्लिक्ट में सिक्योरिटी को प्रायोरिटी
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देता है। और इसी वजह से यह जजमेंट इतना
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