No Oral Modification Clause (NOM Clause) Explained | Contract Law Essentials #law #news #education
Jan 7, 2026
Can a contract be changed verbally after it’s signed?🤔
What happens if parties agree orally but the contract says changes must be in writing?
In this video, we break down the No Oral Modification Clause (NOM Clause) — one of the most crucial yet misunderstood clauses in contract law.
Whether you’re a law student, lawyer, business owner, startup founder, or contract professional, this video will help you understand why oral changes often fail in court and how NOM clauses protect contractual certainty.
🔍 What You’ll Learn in This Video
✔️ What is a No Oral Modification (NOM) Clause
✔️ Why contracts prohibit oral modifications
✔️ Legal purpose and importance of NOM Clauses
✔️ Are oral modifications ever enforceable?
✔️ Key judicial principles governing NOM Clauses
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ग्रीटिंग्स टू वन एंड ऑल। और आज हम बहुत
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ही थोड़ा हटके टॉपिक है बट इंटरेस्टिंग है।
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क्या कॉन्ट्रैक्ट साइन करने के बाद पार्टी
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ऑटोनोमी खत्म हो जाती है? या नहीं? सो नो
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ओरल मॉडिफिकेशन क्लॉज़ जिसे हम एनओ एम
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क्लॉज़ भी कहते हैं। ये क्या है? क्या भसड़
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मचाता है? क्या इसकी सारी नेटिग्रिटीज है?
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आज उसे हम देखते हैं। एक्सप्लोर करते हैं।
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तो बिना किसी वक्त की बर्बादी के आज के
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टॉपिक के साथ शुरू करते हैं।
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सो आज के कमर्शियल कॉन्ट्रैक्ट्स में एक
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कॉमन क्लॉज़ होता है जिसे हम कहते हैं नो
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ओरल मॉडिफिकेशन क्लॉज़ या शॉर्ट में एनओ एम
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क्लॉज़। ठीक है? नॉर्म नॉर्म मत करना।
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एनओएम। ठीक है? प्लीज तमीज में रहो थोड़ा।
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सिंपल शब्दों में समझे तो एनओएम क्लॉज का
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मतलब होता है अगर कॉन्ट्रैक्ट में कोई भी
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चेंज या अमेंडमेंट करनी है तो सिर्फ रिटन
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फॉर्म में और सब पार्टीज के साइन के साथ
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ही वैलिड होगा। मतलब
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सिर्फ बोलकर या बिहेवियर से कॉन्ट्रैक्ट
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चेंज नहीं होगा। सिंपल बात है।
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अब देखो फर्स्ट लुक में यह क्लॉज़ काफी
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सिंपल और प्रैक्टिकल लगता है।
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कंफ्यूजन अवॉइड होता है। तुमने बोला था
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ऐसे टाइप की डिस्प्यूट्स कम होती हैं।
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कॉन्ट्रैक्ट सर्टेनिटी मेंटेन रहती है।
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लेकिन यहीं से एक बहुत इंपॉर्टेंट लीगल
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क्वेश्चन अराइज़ होता है। क्या पार्टीज
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अपनी खुद की ऑटोनोमी लूज कर देती है? मतलब
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क्या एक बार हमने एनओएम क्लॉज़ साइन करने
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के बाद पार्टीज अपना कॉन्ट्रैक्ट ओरल
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एग्रीमेंट या कंडक्ट के थ्रू चेंज ही नहीं
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कर सकती।
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समझ आया? मतलब एक बार एनओएम क्लॉज़ साइन कर
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दिया तो पार्टीज अपना कॉन्ट्रैक्ट ओरल
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एग्रीमेंट है। कंडक्ट के थ्रू चेंज नहीं
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कर सकती है। क्या? सिंपल है। यह क्वेश्चन
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डायरेक्टली पार्टी ऑटोनोमी के कोर
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प्रिंसिपल को चैलेंज करता है। सिंपल।
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इंडियन सुप्रीम कोर्ट का एक रीसेंट जजमेंट
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आया सेपको केस 2025 का यह इस इशू पर
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रीसेंट और इंपॉर्टेंट जजमेंट आया था। ठीक
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है? ये बहुत इंपॉर्टेंट जजमेंट है। पूरा
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नाम बोलूं तो आई थिंक इट वास सेपको
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इलेक्ट्रिकल इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन
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कॉरपोरेशन और आई थिंक जीएमआर का ये केस
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था। सुप्रीम कोर्ट ने क्लियरली बोला। देखो
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एनओएम क्लॉज़ इंडिया में एनफोर्सिएबल हैं।
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एनओएम क्लॉज़ इंडिया में इनफोर्सिएबल है।
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मतलब अगर कॉन्ट्रैक्ट में लिखा है कि
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सिर्फ रिटन अमेंडमेंट वैलिड होगा तो
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कोर्ट्स उस क्लॉज़ को रिस्पेक्ट करेगा।
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कोर्ट्स उस क्लॉज को रिस्पेक्ट करने के
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लिए बाउंड है। लेकिन इंटरेस्टिंग बात यहां
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पर यह है बंधुओं सुप्रीम कोर्ट ने पार्टी
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ऑटोनोमी वर्सेस एनओएम क्लॉज़ के डीपर
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थरेटिकल कॉन्फ्लिक्ट पर डिटेल में डिस्कशन
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नहीं किया। शायद इसलिए क्योंकि अरेंज देखो
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जो आर्गुमेंट में ये इशूज़ डायरेक्टली रेज
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ही नहीं हुए। ठीक है? ये इसका एक वजह हो
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सकती है। अब फॉरेन जुरिसडिक्शन में
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कॉन्फ्लिक्टिंग अप्रोचेस की अगर हम बात
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करें तो अगर हम यूके, सिंगापुर,
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ऑस्ट्रेलिया देखें तो वहां यूनिफॉर्म
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अप्रोच नहीं है। कहीं कई कोर्ट्स हैं
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एनओएम क्लॉज़ को स्ट्रिक्टली फॉलो करते हैं
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और कहीं पार्टी ऑटोनॉमी को ज्यादाेंस देते
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हैं। ठीक है? ये टेंशन बेसिकली दो चीजों
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के पीछे है। कॉन्ट्रैक्ट सर्टेनिटी
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प्रैक्टिकल कमर्शियल रियलिटी। ठीक है?
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यूनाइटेड किंगडम की अगर मैं बात करूं तो
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स्ट्रिक्ट अप्रोच है। यूके सुप्रीम कोर्ट
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का लैंडमार्क जजमेंट है। आई थिंक एमwपबी
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बिजनेस एक्सचेंज सेंटर्स लिमिटेड वर्सेस
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रॉक एडवरटाइजिंग लिमिटेड ये 2018 का केस
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था। इस केस में मेजॉरिटी जजेस ने बोला एक
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बार पार्टीज ने एनओएम क्लॉज़ एग्री कर लिया
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तो ओरल मॉडिफिकेशन तब तक वैलिड नहीं होगा
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जब तक कॉन्ट्रैक्ट के फॉर्म के अकॉर्डिंग
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ना हो।
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ठीक है? और एक फेमस इसमें ऑब्ज़ ऑब्जरवेशन
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था दैट पार्टी ऑटोनोमी ऑपरेट्स अप टू द
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पॉइंट व्हेन द कॉन्ट्रैक्ट इज मेड बट देयर
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आफ्टर ओनली टू द एक्सटेंट दैट द
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कॉन्ट्रैक्ट अलाउस मतलब कॉन्ट्रैक्ट साइन
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होने तक फ्रीडम है। कॉन्ट्रैक्ट के बाद
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फ्रीडम कॉन्ट्रैक्ट के अंदर ही बंद हो
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जाती है। अगर पार्टीज एनओएम क्लॉज़ फॉलो
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नहीं करती तो कोर्ट ये अस्यूम करेगी कि
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उन्होंने क्लॉज़ इग्नोर कर दिया ना कि
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कॉन्शियसली रिमूव किया। यह समझना तो
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एस्टोपेल की बात है एक लिमिटेड एस्केप रूट
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है। यूके सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना अगर
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एक पार्टी अपने कंडक्ट से दूसरी पार्टी को
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मिसलीड करती है और दूसरी पार्टी लॉ सफर
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करती है तो डॉक्ट्रिन ऑफ़ एस्टोपेल अप्लाई
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हो सकता है। लेकिन एनओएम क्लॉज़ होने की
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वजह से एस्टोपेल अप्लाई करना का
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थ्रेशहोल्ड बहुत हाई होता है। सिर्फ
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प्रॉमिस काफी नहीं होगा। समथिंग मोर
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चाहिए।
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यह अप्रोच बाद में रीफर्म हुई। कबाब जी
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साल वर्सेस स्काउट फूड ग्रुप 202 में आपको
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देखने मिलेगा। ये लॉर्ड ब्रिक्स का थोड़ा
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फ्लेक्सिबल व्यू था। देखो सेम केस में
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लॉर्ड ब्रिक्स ने थोड़ा बैलेंस्ड व्यू
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दिया। उन्होंने कहा एनओएम क्लॉज़ तब तक
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बाइंड करता रहेगा जब तक पार्टीज
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एक्सप्रेसली या नेसेसरीली उस क्लॉज़ को
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हटाने पर एग्री ना करें। एग्जांपल दिए।
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जैसे अगर ओरल एग्रीड वेरिएशन तुरंत
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डिफरेंट परफॉर्मेंस डिमांड करती है या डे
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टू डे मैनेजर्स ने वेरिएशन एग्री कर ली
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बिना जाने की कॉन्ट्रैक्ट में एनओएम क्लॉज़
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है तो कोर्ट ये इंप्ल्लाई कर सकती है कि
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एनओएम क्लॉज़ को म्यूचुअली डिस्कार्ड कर
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दिया गया। अब सिंगापुर की बात करें तो
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पार्टी ऑटोनॉमी विंस देयर। सिंगापुर कोर्ट
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ऑफ़ अपील का जजमेंट है। आप पढ़िएगा उसको।
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चार्ल्स लिम टेंगियांग वर्सेस हंगश हो
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2021 का है। यहां कोर्ट ने बोला क्वेश्चन
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ये नहीं है कि पार्टीज ने एनओएम क्लॉज़ के
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बारे में क्या में सोचा या नहीं सोचा?
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क्वेश्चन ये है कि अगर सोचा होता तो क्या
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वो क्लॉज़ से हटने पर एग्री करते?
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सिंपल बात। मतलब पार्टीज की लेटेस्ट
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इंटेंशन ज्यादा इंपॉर्टेंट थी। अर्लियर
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कॉन्ट्रैक्ट कमिटमेंट से भी ज्यादा।
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लेकिन एनओएम क्लॉज़ एक रिबटल प्रिजंपशन
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क्रिएट करता है। रिटन एग्रीमेंट ना हो तो
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नॉर्मली वेरिएशन नहीं मानी जाएगी। लेकिन
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प्रूफ हो तो ओवरऑल वेरिएशन पॉसिबल है।
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ऑस्ट्रेलिया जैसी कंट्री की बात करेंगे तो
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देखो वहां तो मिडिल पाथ है। ऑस्ट्रेलिया
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के सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ साउथ न्यू ऑफ़ सॉरी
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न्यू साउथ वेल्स का जजमेंट है। ठीक है?
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मैथ्यू कैपिटल पार्टनर वर्सेस कोल ऑफ़
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क्वींसलैंड होल्डिंग्स। ये 2012 का केस
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है। पढ़िएगा इसको। कोर्ट ने बोला एनओएम
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क्लॉज़ ओरल या एंप्लॉयड मॉडिफिकेशन को
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कंप्लीटली बाहर नहीं करता। बस ये इनफेरेंस
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ड्रॉ करना थोड़ा मुश्किल बना देता है। मतलब
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क्या हो गया? ओरल मॉडिफिकेशन पॉसिबल है
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लेकिन स्ट्रांग एविडेंस चाहिए। और अगर हम
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अपने देश की बात करें मेरा भारत मान तो
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कहां स्टैंड करते हैं कोर्ट्स? इंडिया में
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कोर्ट्स का अप्रोच अभी थोड़ा मिक्स्ड है।
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देखो जोशी टेक्नोलॉजीस का केस था 2015 का।
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सुप्रीम कोर्ट ने ओरल मॉडिफिकेशन का
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आर्गुममेंट रिजेक्ट किया क्योंकि
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कॉन्ट्रैक्ट में एनओएम क्लॉज़ था। दिल्ली
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हाई कोर्ट में ताईसन क्रप केस जो था क्रूप
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केस 2017 का सुप्रीम कोर्ट का आप ससन पावर
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केस देखेंगे ये भी 17 का ही केस है। यहां
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भी एनओएम क्लॉज़ को स्ट्रांग वेट दिया गया।
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लेकिन इन सब केसेस में पार्टी ऑटोनॉमी
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वर्सेस एनओएम क्लॉज़ का थ्योरी फुल्ली
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आर्ग्यू नहीं हुआ। तो इंडियन कॉन्ट्रैक्ट
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एक्ट क्या कहता है? मुद्दे पर आते हैं।
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इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट के सेक्शन नौ और
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सेक्शन 62 इनका कंबाइंड रीडिंग बताता है
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कि कॉन्ट्रैक्ट को एक्सप्रेसली या
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इम्प्लाइटली मॉडिफाई किया जा सकता है।
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तो बल्ले उड़ गए। इसलिए फर्स्ट ग्लांस में
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लगता है इंडिया को सिंगापुर अप्रोच फॉलो
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करना ही चाहिए। पर एक्सेप्शनंस भी है।
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कोलिपारा केस कोलिपारा वर्सेस आई थिंक
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अश्वत
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नारायण 68 का केस है बहुत पहले का सुप्रीम
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कोर्ट ने बोला था सिर्फ फ्यूचर फॉर्मल
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कॉन्ट्रैक्ट का रेफरेंस होने से ओरल
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कॉन्ट्रैक्ट इनवैलिड नहीं होता है। सब कुछ
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डिपेंड करता है पार्टी इंटेंशन और फैक्ट्स
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पे। अगर इंटेंशन क्लियर है कि फॉर्मल
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कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के बाद ही बाइंडिंग
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होगा तो ओरल एग्रीमेंट बाइंडिंग नहीं
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होता। सिंपल बात है। कमर्शियल सर्टेनिटी
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के एंगल पे अगर हम आते हैं तो एक एनओएम
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क्लॉज़ का पर्पस है। अब्यूज प्रिवेंट करना,
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फेक ओरल डिफेंसेस से बचना और कमर्शियल
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सर्टेनिटी मेंटेन करना। ये रीजनिंग इंडियन
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कोर्ट्स को भी अपील कर सकती है। ठीक है?
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तो इंडिया किस साइड जा सकता है? देखो रॉक
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एडवर्टाइजिंग में जो स्टॉपल बेस्ड
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डाइल्यूजन का कांसेप्ट है वो ऑलरेडी
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इंडिया इंडियन कोर्ट्स जो है वो यूज़ कर
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चुकी है। ठीक है? और इसके केसेस की अगर
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मैं बात करूं तो जॉन डिस्टिलरीज वर्सेस
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बिरहन महाराष्ट्र शुगर सिंडिकेट 2019 और
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सबको केस 2025 जो हम पहले बात कर चुके
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हैं। इसलिए फ्यूचर में इंडियन कोर्ट्स
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काफी पॉस ये इंडियन कोर्ट्स का काफी
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पॉसिबिलिटी है कि यूके सुप्रीम कोर्ट जैसा
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स्ट्रिक्ट एनओएम क्लॉज़ अप्रोच फॉलो करें।
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पार्टी ऑटोनॉमी को रिस्ट्रिक्ट करें। अगर
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पार्टीज के ने खुद एनओएम क्लॉज़ एग्री किया
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है तो। और
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इंडियन कॉन्टेक्स्ट के हिसाब से
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और भी रीजंस ऐड हो सकते हैं जैसे लिटिगेशन
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कल्चर, कॉन्ट्रैक्ट इनफोर्समेंट इश्यूज
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वगैरह वगैरह वगैरह। ठीक है? तो यहां पे ये
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सारी चीजें आती है। अब अगर आपको चाहिए आप
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भी ऐसे ही सारे यू नो सब्जेक्ट्स में अपनी
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एक्सपर्टीज बनाओ तो जाके कमर्स ऑन की
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वेबसाइट चेक करो। हमने ऐसे बहुत सारे
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कोर्सर्सेस डिजाइन किए हैं जो वन ऑफ़ अ
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काइंड कोर्सेस है। पहली बार इंडिया में जो
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आप मिनी कोर्सर्सेस कंप्लीट कोर्सेस या
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डिप्लोमा कोर्सेस के फॉर्म में अवेल कर
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सकते हो। ऑब्वियसली फ्री फोकट में कुछ भी
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नहीं है। सबके लिए पैसा लगता है। ठीक है?
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बट डोंट वरी इट विल नॉट बी हैवी ऑन यू। वो
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हमारी गारंटी। सो एक बार जाके कोर्सर्सेस
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चेक करो। ऐसे ही कॉन्ट्रैक्ट्स एंड
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कमर्शियल डिस्प्यूट्स को लेके इंटरनेशनल
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इनसॉल्वेंसी एसेट रिकवरी को भी लेके हमने
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कई कोर्सेस बनाए हैं। जाइए जाके उन
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कोर्सेस को देखिए और हमें रीच आउट करिए।
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और अब जाओ यह वीडियो के साथ शेयर करो
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जिससे यह सब्जेक्ट जानना बहुत जरूरी है।
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हैव अ गुड डे एंड स्टे ट्यूंड विद जस्ट
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लॉजिकल सी यू।
#Legal Services
#Business & Corporate Law

