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आज हम बात करने जा रहे हैं एक बहुत ही
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इंपॉर्टेंट सुप्रीम कोर्ट ऑब्जरवेशन की जो
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क्वाइटली पास हुई है लेकिन जिसके लीगल और
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इंटरनेशनल इंप्लिकेशंस बहुत गहरे हैं।
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सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने एक रीसेंट
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जजमेंट में यूनियन गवर्नमेंट को सजेस्ट
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किया है कि वो पॉस्को एक्ट 2012 के अंदर
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रोमियो जूलियट का क्लॉज़ इंट्रोड्यूस करने
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पर विचार करें। यह सिर्फ एक क्रिमिनल लॉ
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रिफॉर्म का सवाल नहीं है। यह सवाल है
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चाइल्ड प्रोटेक्शन, एडलेसेंट ऑटोनोमी और
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प्रोपोशनलिटी इन लॉ का। और सबसे
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इंपॉर्टेंट बात यह जजमेंट इंडिया को
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ग्लोबल चाइल्ड प्रोटेक्शन जरिस प्रिडेंस
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के साथ अलाइन करने के डायरेक्शन में एक
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बड़ा स्टेप हो सकता है। हेलो एवरीवन, दिस
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इज़ अनान्या चौबे एंड वेलकम बैक टू अनदर
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एपिसोड ऑफ़ जस्ट बी लॉजिकल। अब वीडियो शुरू
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करने के पहले मैं आपको बताना चाहती हूं कि
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कमर्शियन आपके लिए लॉ क्यूरेटेड नोट्स
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लाया है और लॉ कोर्सेज लाया है। यह
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कोर्सेज आप हमारे वेबसाइट से एक्सेस कर
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सकते हैं और लॉ नोट्स आप हमारे वेबसाइट पे
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एक क्वेरी ड्रॉप करके या WhatsApp नंबर पे
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हमें मैसेज करके या ईमेल आईडी पे हमें मेल
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कर एक्सेस कर सकते हैं। वेबसाइट की लिंक,
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ईमेल आईडी और WhatsApp नंबर डिस्क्रिप्शन
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में दी है। जल्दी जाइए और एक्सेस करिए।
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नाउ विदाउट एनी फदर अडू लेट्स गेट इनू द
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केस के बैकग्राउंड को जानते हैं। यह
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ऑब्जरवेशन सुप्रीम कोर्ट ने दी है। स्टेट
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ऑफ उत्तर प्रदेश वर्सेस अनिरुद्ध एंड
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अनदर। बेंच थी जस्टिस संजय करोल एंड
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जस्टिस एन कोटेश्वरी सिंह। केस का
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प्राइमरी इशू था एज डिटरमिनेशन प्रोसीजर
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अंडर द ड्रिवनाइल जस्टिस एक्ट। लेकिन
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कोर्ट ने जजमेंट के पोस्ट स्क्रिप्ट
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पोर्शन में एक बहुत ही इंपॉर्टेंट
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सिस्टमैटिक इशू रेज किया। कोर्ट ने
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क्लियरली एकनॉलेज किया है कि पॉस्को एक्ट
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का मिसयूज हो रहा है। स्पेशली उन केसेस
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में जहां एडोलेसेंस के बीच कंसेंशियल
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रिलेशनशिप को भी क्रिमिनल बना दिया जा रहा
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यहां पर कोर्ट ने रोमियो और जूलियट क्लॉज़
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अब जानते हैं रोमियो और जूलियट क्लॉज़ है
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क्या? रोमियो और जूलियट क्लॉज़ का मतलब
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होता है अगर दो एडलेसेंस क्लोज इन एज है
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और रिलेशनशिप कंसेंशुअल है और
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एक्सप्लइटेशन कोरजन या अब्यूज नहीं है तो
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उनके बीच सेक्सुअल रिलेशनशिप को क्रिमिनल
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ऑफेंस ट्रीट नहीं किया जाता। इसका पर्पस
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यह होता है एडल्ट प्रिडेटर्स को पनिश करना
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लेकिन टीनएज रिलेशनशिप्स को क्रिमिनलाइज
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ना करना। सुप्रीम कोर्ट ने यह सजेशन इसी
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कॉन्टेक्स्ट में दिया है। अब जानते हैं
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पॉस्को एक्ट की इंडिया में करंट पोजीशन
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क्या है? इंडिया का पॉस्को एक्ट 2012
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दुनिया के मोस्ट स्ट्रिंग चाइल्ड
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प्रोटेक्शन लॉज़ में से एक है। इसके की
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फीचर्स है 18 इयर्स से नीचे के किसी भी
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पर्सन के साथ किसी भी सेक्सुअल एक्टिविटी
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को ऑफेंस माना जाता है। कंसेंट का कोई
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रेलेवेंस नहीं है। यह अप्रोच इंडिया ने
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अडॉप किया था यूएन कन्वेंशन ऑन द राइट्स
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ऑफ़ द चाइल्ड के ऑब्लिगेशन के तहत। लेकिन
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प्रॉब्लम यह है कि लॉ कॉन्टेक्स्ट और एज
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प्रॉक्सिमिटी को कंसीडर नहीं करते और इसका
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रिजल्ट यह है टीनएज रिलेशनशिप्स भी रेप
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केसेस बन जाते हैं। इसी को सुप्रीम कोर्ट
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ने एक एनफोर्समेंट पैराडॉक्स कहा है। अब
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इसकी ग्लोबल पोजीशनिंग क्या है? यह जानते
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हैं सुप्रीम कोर्ट का ऑब्जरवेशन सिर्फ एक
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डोमेस्टिक इशू नहीं है। यह ग्लोबल
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जुरिसप्रिडेंस के साथ डायरेक्टली कनेक्टेड
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है। आज दुनिया के कई डेवलप्ड जुरिसडिक्शन
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में जैसे कि यूनाइटेड किंगडम एज ऑफ़ कंसेंट
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16 है। लेकिन पीियर रिलेशनशिप्स को
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डिफरेंटली ट्रीट किया जाता है। दूसरा
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कनाडा क्रिमिनल कोड अलऊ करता है कंसेंशियल
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एक्टिविटी विद अप टू फाइव इयर्स ऑफ़ एज गैप
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अंडर कंडीशंस। थर्ड है जर्मनी। 14 इयर्स
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के बाद कंसेंशुअल रिलेशनशिप्स अलाउड है
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अगर एक्सप्लइटेशन नहीं हो। फ्रांस,
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ऑस्ट्रेलिया और यूनाइटेड स्टेट्स के
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मल्टीपल स्टेट्स क्लोज इन एज एक्सेप्शन
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फॉलो करते हैं। यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन
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राइट्स ने रिपीटेडली कहा है क्रिमिनल लॉ
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मस्ट बी प्रोपोशननेट एंड कॉन्टेक्स्ट
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सेंसिटिविटी। सुप्रीम कोर्ट का रोमियो
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जूलियट रेफरेंस क्लियरली दिखाता है कि
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इंडिया भी इसी ग्लोबल ट्रेजरी को एकनॉलेज
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इस सुप्रीम कोर्ट ऑब्जरवेशन की
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कॉन्स्टिट्यूशनल सिग्निफिकेंस को जानते
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हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जुडिशियल
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रिस्ट्रेंट फॉलो किया और मैटर को यूनियन
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गवर्नमेंट और पार्लियामेंट पर छोड़ दिया।
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इससे सेपरेशन ऑफ पावर प्रिजर्व होता है।
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लेकिन कोर्ट अपनी कॉन्स्टिट्यूशनल अथॉरिटी
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का यूज करके पॉलिसी डायरेक्शन सेट करता
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है। कोर्ट ने यह भी कहा पॉस्को को पर्सनल
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वेंडिक्टा और फैमिली डिस्प्यूट्स के लिए
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वेपनाइज किया जा रहा है। और डेलीबेट
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मिसयूज़ फॉर पेनल्टीज होनी चाहिए। यह
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अप्रोच ग्लोबली एक्सेप्टेड डायलॉग और
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कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म का एग्जांपल है। अब
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इस ऑब्जरवेशन की इंटरनेशनल और डिप्लोमेटिक
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सिग्निफिकेंस को जानते हैं। यह पॉइंट बहुत
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कम डिस्कस होता है लेकिन काफी इंपॉर्टेंट
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है। इंडिया जब यूएन टीटी बॉडीज, यूनिवर्सल
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पीरियडिक रिव्यू ह्यूमन राइट्स डायलॉग में
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अपीयर करता है तो पॉस्को मिसयूज केसेस ऑफन
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हाईलाइट किए जाते हैं। अगर इंडिया रोमियो
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जूलियट क्लॉज़ इंट्रोड्यूस करता है विथ
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सेफगार्ड्स एंड प्रसीज़ तो इंडिया क्लियरली
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यह दिखा सकता है कि चाइल्ड प्रोटेक्शन
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स्ट्रांग है लेकिन लॉ ह्यूमन और प्रोपोशनल
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भी है। आज के टाइम में लीगल रिजाइंस भी
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डिप्लोमेटिक क्रेडिबिलिटी इंपैक्ट करते
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हैं। इन सेंस में यह रिफॉर्म इंडिया के
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लिए सॉफ्ट पावर एडवांटेज भी हो सकता है।
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अब इसका रिस्क और नीड फॉर प्रसीजन जानते
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हैं। सुप्रीम कोर्ट भी यह मानता है कि ओवर
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करेक्शन डेंजरस हो सकता है। अगर रोमियो
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जूलियट क्लॉज़ ब्रॉड हुआ या वेग हुआ तो
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एडल्ट ऑफेंडर्स फेक कंसेंट का डिफेंस ले
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सकते हैं। इसलिए इंटरनेशनल एक्सपीरियंस यह
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बताता है क्लियर एज लिमिट्स डिफाइंड एज
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गैप्स और जुडिशियल स्क्रूटनी एविडेंस
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बेस्ड सेफगार्ड्स बहुत-ब जरूरी होंगे। अब
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यह एक वाटर शेड मोमेंट क्यों है? सुप्रीम
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कोर्ट का यह पोस्ट स्क्रिप्ट सिर्फ एक
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ऑब्जरवेशन नहीं है। यह एक सिग्नल मोमेंट
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है। यह कह रहा है कि एब्सोल्यूट
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क्रिमिनलाइजेशन सस्टेनेबल नहीं और
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एडलेसेंट रियलिटी को इग्नोर नहीं किया जा
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सकता। क्रिमिनल लॉ को ह्यूमन डिग्निटी और
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प्रोपोशनलिटी के साथ चलना होगा। अगर
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पार्लियामेंट इस सजेशन को लेजिसलेशन में
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कन्वर्ट करती है तो इंडिया
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अपना चाइल्ड प्रोटेक्शन फ्रेमवर्क
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स्ट्रेंथन करेगा और ग्लोबल लीगल रिफॉर्म
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के साथ हार्मोनाइज करेगा और एक मॉडल
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मैच्योर रूल ऑफ लॉ सिस्टम का एग्जांपल सेट
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करेगा और इसी के साथ हम कह सकते हैं कि
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पॉस्को रिफॉर्म का यह पहला रियल टर्निंग
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पॉइंट हो सकता है। अगर आपको यह वीडियो
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पसंद आई और आप चाहते हैं कि मैं ऐसी
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वीडियोस और बनाऊं जिसमें हम सुप्रीम कोर्ट
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के जजमेंट्स या हाई कोर्ट्स के जजमेंट को
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ग्लोबली वो कैसे इंपैक्ट करेंगे यह डिस्कस
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