Akbar The Great Part 1 | #india #indian #mughalempire #akbarthegreat #hisotry #indianhistory
Nov 4, 2024
Bharat Ek Khoj—The Discovery of India
A Production of Doordarshan, the Government of India’s Public Service Broadcaster
Episode 32: Akbar, Part I
With Kulbhushan Kharbanda as Akbar, Virendra Sexena as Birbal, Harish Patel as Todar Mai, Rajesh Vivek as Sheikh Mubarak, Pankaj Berry as Abul Fazai, Irfan Khan as Badayuni, Puneet Issar as Rana Pratap, S.P. Dubey as Abdul-Nabi, Surendar Pal as Man Singh, Arun Bakshi as Atga Khan, and Ayub Khan as Munim Khan.
As Nehru noted, Babur died within four years of his coming to India and much of his time was spent in fighting and laying out a splendid capital in Agra. Hankering for Central Asia, Babur had won an empire in India; scorning Central Asia, Humayun lost the whole empire in India. Humayun encountered Sher Shah Suri, a well-prepared Afghan contender for sovereignty and, in the ensuing tussle in 1540 near Kanauj, he barely escaped with his life, but the Mughal troops were decimated. Humayun became a fugitive. The enthroned Sher Shah Suri had a short reign, installing energetic administrative reforms with excellent roads, horse-backed postal systems and stylised monuments. His remarkable reign came to an end in 1545 with his death.
By 1555, Humayun reclaimed Delhi, but stumbled to his death next year. His son Akbar, barely 13, came out of the seraglio where he was under protection of uncle Bayram Khan, as regent, and reigned from 1556-1605. Drawing from Abul-Fazl’s imperial memoir Akbar-Nama, we see scenes of market prices being controlled (with Akbar intervening incognito). The young king proceeds to marry Jodhabai, the Rajput princess of Amber, and abolishes the discriminating Jaziya tax on the Hindus. As Nehru observes, Akbar surrounds himself with a group of brilliant men devoted to him and his ideals among whom are famous brothers Abul-Fazl and Fyzee, humorist Birbal, the trusted Rajput Raja Man Singh and the valiant general Abdul Rahim Khankhana.
But the quarrel continues with the orthodox Ulemma, to whom the Sufi saint Sheikh Mubarak is hauled up. While most Rajput chiefs are amalgamated in the imperial system of broad-based Omrah (nobility), Rana Udai Singh of Mewar, and his valorous son Pratap Singh, prove recalcitrant, notwithstanding Man Singh’s honest persuasions. Akbar lays a punitive siege of Chittor, but despite the defeat at Haldighat, and flight of Udai Singh and Pratap Sigh to sanctuary in the hills Chittor is never re-occupied.
As Nehru states, his royal court became a meeting place, almost an Ibadatkhana (prayer-hall), every Friday, for men of all faiths and those who had new ideas or inventions. His tolerance of views and his encouragement of all kinds of beliefs and opinions, including Sufism, angered some of the more orthodox Muslims like the Sayyads. Included in Akbar’s theological forays are, as we find, Portuguese priests. In 1580, the padres hastened from Goa confident of the most sensational conversion of all times! In the event, they are disappointed as were all other disputants.
Akbar’s quest for spiritual enlightenment was to seek a faith that would satisfy the needs of his realm as well as his conscience. As a result, he came up with a new religious order Din-E-Ilahi. The cultural amalgamation of Hindu and Muslim in north India took a giant step forward, with Akbar as popular with the Hindus as with the Muslims.
Producer Doordarshan
Language Hindi
Credits
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0:02
[संगीत]
0:09
अपनी सैनिक कुशलता के बल पर बाबर ने उत्तर भारत का काफी हिस्सा जीत लिया था लेकिन
0:17
उसका बेटा हुमायूं अपने बाप की तरह सिपाही नहीं था और बाबर की मौत के 10 साल बाद
0:24
1540 में शेर खान नाम के अफगान सरदार ने उसे
0:29
हरा हिंदुस्तान से बाहर खदेड़ दिया और शेरशाह सूरी के नाम से शासन संभाला वो आला
0:37
दर्जे का प्रशासक था और जंगो के बीच में भी उसे नई मालगुजारी प्रणाली लागू करने का
0:43
समय मिला लेकिन 5 साल में ही शेरशाह की मौत
0:48
हुई और हुमायूं अफरातफरी का फायदा उठाकर ईरान से फौज लेकर 1556 में हिंदुस्तान
0:56
आया 16 साल बाद अब वो फिर से दिल्ली के सिंहासन पर बैठा मगर छ महीने बाद ही वह एक
1:05
जीने से गिर कर मर गया जब हुमायूं राजपुताना के रेगिस्तान में शेरशाह से
1:10
छिपता फिर रहा था तब उसकी बीवी ने एक बेटे को जन्म दिया हुमायूं के बाद यह बेटा
1:17
बादशाह अकबर कहलाया उस समय उसकी उम्र सिर्फ 13 साल थी बैरम खां उसका सरपरस्त और
1:24
निगरा था मगर चार ही बरस में अकबर इस सरपरस्ती और दूसरों के इशारों पर चलने से
1:32
उब गया और उसने अपने शासन की बाग डोर अपने हाथों में संभाल ली
1:55
[प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा]
2:08
[प्रशंसा] आइए जनाब ये ज्वार क्या भाव है 10 दमड़ी पर आप
2:17
चावल लीजिए बड़े अच्छे हैं खुशबूदार
2:24
बाजरा 15 दमड़ी मन और गेहूं 20 ड़ी मन और घी भैया ये क्या लगा
2:33
रखा है आपको लेना क्या-क्या है कोई बढ़िया हो सकता है वो भी ले वो भी ले ये भी ले हां घी 125 दमड़ी और ये गुड़ खा 65 दमड़ी
2:42
कीमत कुछ ज्यादा नहीं है 20 से 30 फीसद ही ज्यादा क्या कह रहे हैं जनाब आप भले मानस
2:48
दिखे हैं इसके लिए वाजिब दाम बताएं इसका क्या मतलब कि कीमतें बढ़ गई है भाई बढ़िया तुम मानो या ना मानो कीमत तो ज्यादा है अ
2:55
अच्छा छोड़ो ये बताओ कि आपको लेना कितना कितना है सब कुछ लेना है आधा आधा मन आधा आधा मण तब तो कीमतें कम नहीं होगी आधा आधा
3:03
मण इसीलिए तो कह रहा हूं कीमतें ज्यादा है अरे पूरा बाजार छाड़ मारो कहीं कम दाम में
3:09
मिल जाए तो मुफत में ले जाना क्या पूरा बाजार चढ़ा हुआ है क्या है भाई अगर आपको
3:15
नहीं लेना तो आप आगे बढ़ो अब हाथ जोड़ता हूं आगे जाओ जाओ आप हमसे चाहते क्या है अब
3:21
आप जनाब इन श्रीमान को देखें एक तो हमसे कर्ज लिया ऊपर से वापस देने का नाम ही नहीं लेते तो के बात क्या कहा वापस लेने
3:28
का नाम नहीं लेंगे एक तो मनमानी पर हु श्रीमान ब्याज की दर सबके लिए बराबर है आप
3:34
कोई अलग नहीं है हम अलग नहीं है जानते हैं हम कौन है अगर आपके के बेटे आदम खान का
3:42
साथी बदमाशों का सरस् मेरी बात माने चले को पन लेगा र जरा
3:52
ठहरते अरे भैया ये भी कोई बात होती है उनकी जो बात कहे सब ठीक और हमारी सही बात भी गलत हद होती हैन तो उन लोग से क्या
3:59
चाहि य परदेश से कैसे परदेसी भाई अरे दद्दा बस तुरक को जाते हुए नहीं देखा बादशाह के दरबार में ऐसे ही लोग तो भरे
4:05
पड़े हुए हैं ईरानी रानियों का मेला होही ग है दरबार अगर कोई नाइंसाफी होती है तो बादशाह हुजूर से शिकायत क्यों नहीं करते
4:12
ददा आप क्या बोल रहे हैं वो हमारा बादशाह नहीं वो तो सगरे मुगल परदेसी हो अरे बहुत स्याने हो रहे हो दद्दा वो 30 साल से यहां
4:18
है और 30 साल के बाद भी वो परदेशी रहे गए अरे भैया आप जो बात भी कहो पर हम य बात नहीं माने वो तो बाहर से आया हुआ तो
4:23
परदेशी है ना हिंदुस्तानियों के बीच में उनकी कोई जगह नहीं बादशाह अरे कहां कहां वही जिसके साथ अरे अरे अरे सु सुबह ही
4:31
सुबह चढ़ा रखे का रे अरे बेवकूफ जिसको उसको बादशाही बोल देते हो सुना आपने
4:36
बादशाह कल भेज बदल के बाजार के मुआय पे निकले थे हम यह बात खतरे से खाली नहीं है
4:43
यह बात हमें उन्होने समझाना चाहिए श्रीमान जी एक माने में यह अच्छा ही हुआ जिस बात
4:48
की शिकायत मैं बरसों से कर रहा था उन्होंने उसकी सच्चाई देख ली जब खुद खरीदारी पर निकले तब पता चला कि कीमतें
4:56
जमीन छोड़ आसमान प निकल चुकी हैं आपकी बात बिल्कुल सही है मल इस वजह से बादशाह महसूल के कायदे में
5:03
शायद ही कोई तब्दीली करें जनाब आप वजीर आजम है आप उन्हें मशवरा दे सकते हैं जरा
5:08
मेरी बात तो गौर से सुने कए अफगान शेरशाह के जमाने से देश के किसान फसल का तीसरा
5:16
हिस्सा लगान में देते रहे हैं पर अब अब हम उनसे अनाज के बदले नकद रकम मांग रहे हैं
5:22
तो इसमें गलत क्या है गलत तब नहीं होता जब हम उनसे अनाज की सही कीमत मांगते या उनके
5:28
अनाज की वो कीमत लगाते जो गांव की मंडी में चल रही है हम जो कीमत लगा रहे हैं वह दिल्ली बाजार के हिसाब से है इसलिए एक
5:35
तिहाई अनाज के बदले किसान जो रकम जमा कर रहा है वह बहुत ज्यादा है और यही वजह है
5:41
कि किसानों में असंतोष बढ़ता आ रहा है आपकी बात बिल्कुल सही है मेरे ख्याल से
5:48
लगान वसूली के मौजूदा कायदे को ठीक करके बादशाह हुजूर के सामने पेश करना चाहिए जी
5:53
बिल्कुल जनाब आदम खान कहिए क्या बात है कोई खास
6:01
बात इस इंसान में जरा भी तमीज नहीं है हम देख रहे हैं कि ये लगातार हमारी बेइज्जती
6:08
किया जा रहा है आदम खान जरा तमीज से बात कीजिए बेशक आप बादशाह अकबर की दाई के बेटे
6:14
हैं मगर इससे आपको ये हक नहीं मिल जाता कि आप बिना इजाजत यहां पे आए और हमारे काम
6:19
में रुकावट डाले आप इस बात को भूल रहे हैं कि बादशाह अकबर ने मुझे वजीर आजम का ओहदा
6:25
दिया है समझे आप वजीर आजम
6:34
आदम खान बादशाह की तरफ जाने की गुस्ताखी ना करें आदम खान
6:42
[संगीत]
6:54
सिपाहियों दरवाजा खोलो दरवाजा खोलो हुजूर हुजूर कौन
7:02
है क्या बात है बाब क्या कह उन्होने हर में दखने की जरत की है किसने आदम खान ने र
7:10
उन्होने वजीर आजम का कल कर दिया है दरब में क्या क रहे हो हा र उनकी लाश ब च पड़ी
7:15
है में कोई और है हा र द टर मल मुनीम खान और से क सियो को ले ह कीत करें मैं आदम
7:23
खान को देखता हूं जी
7:28
र दरवाजा खोलो आदम
7:33
खान तलवार डाल दो
7:39
डाल अब बताओ तुमने वजीर आजम का कत्ल क्यों
7:44
किया क्योंकि क्योंकि आपने मुझे वजीर आजम बनाने के बजाय उस उस कंबक को वजीर आजम का
7:51
ओहदा दिया था बद मौश तुमने हमेशा उकम दूली की हमने कहा था कि हारे हुए लोगों को
7:58
गुलाम ना बनाए जाए उनको इस्लाम कबूल करने पर मजबूर ना किया जाए पर तुमने हमेशा उन
8:05
पर ज्यादति की बताओ तुम्हारी य हरकत गैर कानूनी थी कि नहीं हम पर कोई कानून आयद
8:10
नहीं होता हम हम कोई मामूली दरबारी नहीं है हम आखिर भाई है आपके भाई
8:18
भाई भाई नहीं तुम कमीने नीच और गुस्ताख
8:24
इंसान हो हमारी वालिदा ने आपकी परवरिश की
8:30
है आपको दूध पिलाया है उन्होंने उनके बगैर वजूद ही क्या था आपका
8:37
बैरम खान के हाथों की कठपुतली थे आप हमने आपको तखत पर बिठाया आपके बादशाह की हिफाजत
8:44
की है हमने और अब अब आप हमको ही आखे दिखाने लगे वो बातें कब की खत्म हुई अब
8:52
मैं तुम लोगों की ग्रफ से बाहर हूं समझे गलत फहमी है आपको आप हमारी गिरफ्त से कभी
9:08
भी गिरफतार करलो इसे ले जाओ इसे नहीं भाई साब नहीं और जंजीरे बांध कर किले की दीवार
9:16
के नीचे फेंक दो अगर जिंदा बच जाए तो दोबारा फेंक दो इसे
9:33
बैरम खान बादशाह अकबर के हक की हिफाजत करने वाला भला इंसान
9:41
था मगर उसका कत्ल कर दिया गया बादशाह की दाई महम अन और उसके बेटे
9:51
आदम खान ने अपने हिसाब से ही अकबर बादशाह को चलाना शुरू किया मैं अच्छी तरह जानता था
10:00
के पूरी आजादी से हुकूमत चलाने की ख्वाहिश रखने वाले नौजवान बादशाह अकबर एक ना एक
10:07
दिन जरूर अपनी दाई और उसके बेटे की गिरफ् से बाहर आ जाएंगे मगर यह उमीद मुझे नहीं थी कि यह सब
10:14
इतनी जल्दी होगा और इतने भयानक ढंग से हुकूमत चलाने और आवाम को समझने की
10:23
जितनी गहरी नजर अकबर बादशाह के पास थी उतनी तो हमारे पुराने मालिक शेरशाह
10:30
सूरी के पास भी नहीं थी बादशाह अकबर की हमेशा यही कोशिश रहती
10:36
कि वह ऐसे हुक्मरान बने जिसे देश का हर छोटा बड़ा अपना
10:43
माने महारानी जोधाबाई के साथ विवाह करके उन्होंने हम सबको अचंभे में डाल दिया
10:52
फिर हिंदुओं द्वारा दिया जाने वाला जजिया कर माफ कर दिया
10:59
और उलेमा ने इसका सख्त विरोध किया हुकूमत की नजर से मुझे भी ऐसा लगा था कि जजिया
11:05
खत्म कर देने से सल्तनत की आमदनी पर भारी असर
11:11
पड़ेगा मगर बादशाह के इस कदम से हिंदुओं का विश्वास उन पर और बढ़
11:18
गया लड़ाई में हारे हुए लोगों को गुलाम ना बनाया जाए इस्लाम कबूल करने के लिए उन्हें
11:25
मजबूर ना किया जाए तरक्की पसंद खयालों को बढ़ावा दिया जाए मुझे पूरा विश्वास था इन
11:32
सब बातों के लिए उन्हें उलेमा से जूझना पड़ेगा मगर अकबर बादशाह को यह मालूम था कि
11:38
उलेमा से कब सख्ती से पेश आना चाहिए और कब उनकी कदर करनी
11:45
चाहिए शेख मगदूम मुल्क यह घटना आगरा में हुई सरे बाजार हुई और आप यह तो मुझे भी
11:52
मालूम है मगर य हा किस हादसे की बात कर रहे मोहतरम हुजूर मैं पिछले दिनों आगरा के
11:58
बाजार में हुए झगड़े की बातचीत कर रहा हूं वो झगड़ा शेख मखदूम मुल्क के लोगों ने
12:03
भड़काया था सरासर छूट है ये दंगे के जिम्मेवार मीर हश थे उन्हें अपना सिला मिल
12:08
गया है जांच से पता चला है हुजूर कि मीर हस खुद को काजी समझते थे पर सरे बाजार ना
12:15
जाने क्यों शेर मखदूम मुल्क के लोगों ने उनका कत्ल कर दिया और फिर तो खून की होली
12:20
छड़ गई हुजूर वह अपने आप को काजी समझता था
12:26
दरअसल वो था एक मुनसर एक मेदवी राजा बीरबल शायद हमारी बात नहीं समझ सकेंगे मगर आप
12:32
यकीनन समझेंगे वह मुसलमानों को भड़काता था इसलिए हमारे आदमियों ने उसे हमेशा के लिए खामोश
12:38
कर दिया और यही फसाद का कारण बना हां हुजूर यह मेदवी बेहद खतरनाक होते हैं और
12:44
सच्चे मुसलमानों के भेस में छिपे रहते हैं हमने एक और देहरी को बेनकाब किया है जो
12:50
इज्जतदार मुदस माने जाते हैं और नौजवानों के दिमाग में जहर घलते रहते हैं उनका नाम
12:55
है शेख मुबारक और हमारी अर्ज है कि उसे माओ के सामने हाजिर होने का हुक्म दिया
13:00
जाए नहीं नहीं नहीं नहीं नहीं शेख मुबारक को दरिया कहना उनका अपमान है व तो एक रोशन
13:06
दिमा आलिम है हमारा भी यही ख्याल है ऐसे बुजुर्ग के लिए ऐसी दुश्मनी री
13:12
बातें करना ठीक नहीं हुजूर वह शरिया की मुखालफत करता है और फिर खुद को शरिया का
13:18
सच्चा हिमायती भी मानता है हमें उससे सवाल जवाब करने और उसके झूठे यकीन की असलियत
13:24
जाहिर करने का पूरा हक है हम मजहब के सरपरस्त हैं हमसे यह हक कोई नहीं छीन सकता
13:29
आपसे आपका कोई हक नहीं छीन रहा जनाब सल्तनत के हर छोटे बड़े मजहबी मामले
13:36
में आपके मशवरे लिए बगैर हम एक कदम भी नहीं उठाते माफ करना हुजूर हमारा ख्याल
13:42
ऐसा नहीं है वरना आप जजिया खत्म करने के मुतालिक हमसे मशवरा जरूर करते
13:48
देखिए वो सियासी मामला है शेख मुबारक का बर्ताव मजहबी है उसका
13:56
फैसला करने का हक आपको है तो र उसे फौरन गिरफ्तार करके हमारे आगे पेश करने का
14:02
हुक्म जारी
14:07
करें जैसा आप चाहे हुजूर क्या इस दुनिया का अंत आ गया है कि ती लोग चन सेए और भले
14:15
इंसान दुख सहने के लिए मजबूर किए जाए क्या यही आपके दरबार का न्याय है
14:21
बीरबल हम सियासत से जुड़े हुए आदमी है मजहबी मामलो में दखल अंदाजी करना
14:29
हमारे लिए ठीक नहीं उलमा की राय है कि शेख मुबारक काफिर है इसलिए उन्हें सजाए मौत दी
14:38
जाए हम कर भी क्या सकते हैं आप शेख मुबारक को बुलाए और उलमा के साथ उनकी बैठक का
14:45
इंतजाम [संगीत]
14:50
करें रात का पहला पहर
14:56
जागते रहो अस्सलाम वालेकुम वालेकुम सलाम तशरीफ रखो
15:02
बलाए कहो कैसे आना हुआ जनाब बुरी खबर है
15:07
दरबार से मेरे दोस्त ने खबर की है कि उलेमा ने बादशाह से आपकी गिरफ्तारी का गुम जारी करवा लिया है सुबह तक यहां सिपाही आ
15:13
जाएंगे जनाब मेरे दोस्त की सलाह है कि आप तब तक कहीं छुप जाइए जब तक आपके हक में लड़ने के लिए दरबार में आपके हमदर्द
15:19
इकट्ठे नहीं हो जाए बदा योनी माना कि दुश्मन ताकतवर है पर खुदा हर पल चौकस रहता
15:25
है और जब एक इंसाफ पसंद बादशाह हुकूमत करता है तो जालिमों का सामना करने में खौफ
15:31
की क्या बात और फिर उमा साबित क्या करेंगे हमारे वालिद मोहतरम ने कभी ऐसा कुछ
15:36
नहीं कहा जो मजहब के खिलाफ हो अबू फजल तुम बात को नहीं समझते हो शरीयत में किसी भी
15:42
तब्दीली को गुनाह माना जाता है और मेदवी फिरके की तरफ शेख मुबारक का रुझान कोई छिपी हुई बात नहीं है तो क्या मेदवी का
15:48
वजूद मजहब के खिलाफ है कुफ्र है अ इतनी तंग नजरी क्यों बनी एक ही चीज को देखने के
15:55
कई नजरिए भी तो हो सकते हैं और इस्लाम में भी मंजिल तक पहुंचने के कई रास्ते बताए गए हैं माफ करना मेरे भाई तुम रट्टू तोते की
16:01
तरह बात करते हो ल जलूल फलसफे में उलझे रहने वाले तुम इस्लाम के बारे में क्या
16:07
समझते हो बस कीजिए बदाय मैं भाई की बेज्जती बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर सकता आप खुद क्या है उलेमा के हाथ की एक कठपुतली
16:14
बाबा आपने आस्तीन में एक सांप पाला है साप बहुत हुआ चुप करो तुम सब लोग मेरे शागिर्द हो या एक
16:21
दूसरे पर झ पटने वाले वसी जानवर जबान काबू में रखो और फैजी
16:27
तुम बदाई मेरी बात समझो कोई भी मजहब या कोई ईमान अपने आप में
16:35
पूरा नहीं होता और यह भी कहना गलत होगा उसमें कोई काम की बात नहीं अगर मैं किसी
16:41
नए ख्याल की तारीफ करता हूं तो मुझको गलत नहीं समझना चाहिए बादशाह उसको समझते हैं
16:47
इसीलिए किसी उलमा के सामने पेश होने में ना मुझे कोई डर है
16:53
मोहतरम मैंने फर्ज मानकर आपको आगाह किया है
16:59
ठीक है बाकी आपके हाथ में सुबह तड़के सिपाही आए मगर हम पहले ही
17:07
घर छोड़ चुके थे हम ना मिले तो गुस्से में आके उन्होंने हमारे मकान का अगला हिस्सा
17:13
ही तोड़ दिया और व चौकी भी तोड़ डाली जिस पर बैठकर मैं शागिर्द के सामने तकरीर किया करता
17:19
था हमारा भाग निकलना शायद ठीक ही था मगर जवान बादशाह अकबर पर यकीन करने की
17:27
मेरी ठोस वजह है जिस दिन बादशाह अकबर 20 बर्ष के हुए उन्हे
17:33
एक रूहानी तजुर्बा हासिल हुआ यकायक उन्हें लगा अपने अंदर रूह में खालीपन का एहसास
17:39
हुआ और यह मायूसी कई दिन तक रही और जब मैंने यह सुना तभी मुझे अंदाजा
17:48
हो गया कि बादशा के दिमाग में ईमान को लेकर के एक जद्दोजहद चल रही
17:54
है वही कमोबेश जो मुझे बरसों से सता रही है यही वो ठोस
18:00
वजह है जिसके बिना पर बादशाह अकबर से जहनी तौर पर वो मुझे समझ सकेंगे सूफी संतों के
18:07
बीच भी बादशाह अकबर ने अपनी दिमागी उलझनों के जवाब को ढूंढने की कोशिश की वह हर बरस
18:14
अजमेर शरीफ जाते और वहां हजरत मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर मथा
18:20
टेकते और हां वो सलीम चिश्ती के मुरीद भी बने जो आगरे के करीब सीकरी गांव में
18:28
चट्टान की छाया में रहते थे हजरत ने बादशाह अकबर की मुराद पूरी की
18:34
और उन्हें दुआ दी कि उन्ह तीन बेटे होंगे और बरस भर के अंदर ही जोधाबाई नेने शहजादे
18:40
सलीम को जन्म दिया बादशाह अकबर की खुशी का ठिकाना ना रहा उन्होंने उसी वक्त हुक्म
18:46
जारी किया कि दारुल सल्तनत सिकरी के करीब बनवाई जाए मगर पूरी तौर पर सुकून उन्ह हजरत सलीम
18:54
चिती से भी मिल सका [संगीत] राए
19:00
ना बनाए बतिया कुछ ही दिनों बाद मेरे बड़े बेटे
19:06
फैजी ने मुझे पैगाम भिजवाया कि हालात अब आपके हक में है अब आप आगरे वापस चले आए
19:12
उसी दरमियान बादशाह अकबर ने गुजरात फतह की और इस खुशी में एक शाही जश्न का ऐलान किया
19:19
तभी मुझे लगा कि बादशाह के रूबरू होकर अपने ख्यालात का इजहार करने का एक सुनहरा
19:25
मौका है और मैं पादशाह उस अजीम हस्ती के हासिल करने
19:30
चल गुजरात पर फते को यादगार बनाने के लिए हमने फैसला किया है कि अपनी नई दारुल
19:36
सल्तनत का नाम फते आबाद रखेंगे ब बधाई जहां पना आज जबक सारी दुनिया आपको
19:48
मुबारकबाद दे रही है मुझे आपके लिए एक इमी पैगाम सुनाई दे रहा है पम जाहिर करें शेख
19:55
मुबारक हुजूर कुछ इस तरह की गब आवाज सुनाई देती
20:04
है सानी दुनिया प बादशाह अकबर ने बखूबी फत
20:10
पाई इसलिए उन्हे रूहानी दुनिया का आला पेशवा मुंत किया जाता
20:19
है जपना आपसे गुजारिश है कि मजहब में कयामत
20:26
परस्ती को खत्म कर अकल मंदी को बढ़ वाह इस मौके पर आपका यह पैगाम सबसे निराला
20:34
है इससे वाकई हम बड़ी ताकत मिली बहुत बहुत शुक्रिया आपका हुजूर यह है मेरा शागिर्द
20:41
कादर बदा और यह मेरा बेटा अबुल फजल अगर यह भी आपके बड़े बेटे फैजी की तरह
20:48
अच्छा बोलते हैं और इनके खयालात आपकी तरह उदा है तो यह भी हमारी दरबार की रौनक
20:54
बढ़ाएंगे ज अपना बहुत बहुत शुक्रिया हा तो जनाब वो अमीर भले दरबार उ खड़ा
21:01
हुआ और मुझसे ऊंची आवाज में उसने पूछा कि हम सब तो गोरे चिट्टे पर आप काले
21:08
क्यों मैं समझ गया कि जनाब मुझसे जलते हैं और मुझे हुजूर की नजरों में गिराना चाहते
21:13
हैं मैंने बड़ी संजीदगी से जवाब दिया कि मोहतरम आपके सवाल का जवाब तो बेहद आसान है
21:19
जब खुदा ने रंग बिरंगी तितलियां बनाई मछलिया बनाई परिंदे बनाए जानवर बनाए तब भी
21:25
उसके पास दुनिया को देने के लिए कुछ बेशकीमती तोहफे थे चुना उसने आदमी हां
21:30
आदमी बनाया और आदमी से उसने कहा कि देखो मैं तुम्हें वो हर चीज दूंगा जो तुम चाहते
21:36
हो लेकिन शर्त यह है कि तुम्हें उसे लेने के लिए खुद मेरे पास आना पड़ेगा तो खुदा
21:41
के दरबार में एक तरफ शक्ल बट रही थी एक तरफ अक्ल बट रही थी और एक तरफ दौलत तो भाई मैं तो सबसे पहले वहां पहुंचा जहां अकल बट
21:48
रही थी और अकल लेने के बाद जब मैं खूबसूरती लेने के लिए पहुंचा तो खूबसूरती खत्म हो
21:54
चुकी
22:00
जवाब लेकिन एक मिनट लेकिन वो हमारे दोस्त
22:06
जो दरबार में बैठे हैं और बे खूबसूरत है जब अकल लेने के लिए पहुंचे तो अकल खत्म हो
22:15
चुकी दर में र बल कोई
22:23
नहीं आप हमें थोड़ा सा वक्त दे सकते हैं क्यों नहीं हम चहल कदमी के लिए चले हुजूर
22:31
यहां चहक लिए थोड़ी चहल कदमी भी हो जाए चलिए
22:39
शुक्रिया हुजूर महफिल से आपको इस तरह उठा लाने के लिए क्षमा चाहता हूं नहीं कोई बात नहीं
22:47
दरअसल मैं चाहता था कि दरबारी बातों से हटकर कुछ बातें हो सके कोई गहरी बात लगती
22:53
है राजा टरमल सल्तनत के इंतजाम के लिए कहीं आप
22:58
ज्यादा रकम की मांग तो नहीं करना चाहते जी नहीं
23:03
हुजूर हुजूर कुछ महीने पहले प्रयाग के पास एक जागीर में कुछ गांव वालों ने मिलकर
23:09
बगावत करने की कोशिश की बागी गुस्से में थे क्योंकि उन्हें ऐसा लग रहा था कि
23:16
जागीरदार उनका शोषण कर रहा है गुस्से में आकर बागियों ने जागीरदार के कारिंदे की
23:21
हत्या भी कर दी गांव के मुखिया को गिरफ्तार किया जा चुका है बागी मुखिया और जागीरदार को मैंने यहां
23:31
बुलवाया है हुजूर एक बात मैं आपको बता दूं वह
23:36
दोनों यह नहीं जानते कि वह आपसे मिलने जा रहे हैं इसलिए हो सकता है कि आपके सामने
23:43
बोलने से वह हिचके व आप मुझ पर
23:53
[संगीत] छोड़िए राजा टरमल माफ करें मेहरबानी करके
23:59
बताए आप मुझसे चाहते क्या है मैं कई दिनों से आपके जवाब का इंतजार कर रहा हूं इतना ही नहीं इस तन्हा जगह में मुझे इस शख्स के
24:06
साथ रहना पड़ रहा है जो कि एक मुजरिम है श्रीमान जी आप घोड़े से नीचे उतर और जरा तमीज से बातें कीजिए इस समय आप जहांपना
24:13
अकबर के सामने खड़े हैं हां कहो तुमने जागीरदार के खिलाफ
24:22
बगावत क्यों की हुजूर हम कहो डरो मत हुजूर जोन जागीर में हमार गांव है उकी कीमत हर
24:29
साल 00 सालाना तय की गई रही और य रकम हम बिना नागा किए जागी दार साहब को देते रहे
24:36
पिछले साल जागी दार बदले और नवा जागी दार भाए और इन्होंने अदायगी की रकम 20000 से
24:42
बढ़ाकर 00 कर दी हमने हम पंचन इनसे अरज करले कि सरकार य रकम चुका खातिर हम पर
24:49
जुर्म ना करो पर य ना माने हमार छोटे छोटे बाल बच्चा है हम इतना कहे लेकिन य ना माने
24:56
पिछले साल तो हम 00 कैसे जगत इन दे दिए पर इस इस साल तो सरकार हमारी सगरी फसल बा में
25:02
ब गई सरकार हम कहां से चुकाते हैं पर इन्होने जोर किया तो हमार कुछ गुसल मन ने
25:09
गुमास्ता का कत्ल कर दिया हुजूर हुजूर हमें माफ करें माफ करें
25:15
सरकार क्यों जी आप एक बरस की अदायगी माफ क्यों नहीं कर देते हुजूर इसमें मुझे बहुत
25:21
मुश्किल होगी जब यह जागीर मुझे सौपी गई थी तो इसकी कीमत 00 बताई गई थी मगर बाद में
25:26
पता चला यह जागीर 20000 से ज्यादा की नहीं है अब मुझे तो 300 के हिसाब से अपना हिस्सा जमा करना है मैंने 300 घोड़े और कई
25:34
आदमी भी रखे हैं मगर जागीर की कीमत में इतना इजाफा कैसे हो गया
25:40
हुजूर गलती जागीर की कीमत आंकने वाले हाकिम की है जब किसी अमीर को कोई जागीर
25:48
पसंद नहीं आती तो हाकिम उसकी कीमत बढ़ा चढ़ कर बता देते हैं लालच में आकर अमीर वो
25:54
जागीर ले लेते हैं और किसानों से बढ़ी रकम मांगते हैं बस यहीं से झगड़ा शुरू हो जाता
26:10
[संगीत] है टोडरमल जी जी हम सोच रहे थे कि आपके
26:19
रहते हर चीज कायदे से चल रही है अब आप बताइए कि हम क्या करें हुजूर हमें किसानों
26:26
से सीधे मालगुजारी वसूल करनी चाहिए अमीरों की मफत नहीं तो मालगुजारी इकट्ठा
26:32
कौन करेगा हुजूर हमें चाहिए कि हम हाकी में मालगुजारी का नया उदा तैयार करें चुने
26:39
हुए लोगों को तालीम दे और पूरे मुल्क में मालगुजारी इकट्ठा करने का एक काम तरीका
26:45
बनाए न हाकिम को एक ही कानून के हिसाब से काम करना पड़ेगा और उन्हें एक ही खिताब
26:52
दिया जाएगा हाकिम के लिए पुरानी चली आ रही भाषा का ही इस्तेमाल किया जाएगा
26:58
इससे फायदा यह होगा कि गुजरात के किसी हाकिम का तबादला अगर पंजाब कर दिया जाए तो
27:04
भी पूरी मुस्तादी के साथ वह अपनी नई जगह पर काम कर सकेगा इससे तो जागीर की अहमियत कम हो
27:13
जाएगी मगर अमीर और जागीरदार इसको कैसे
27:23
लेंगे फिर इस मुद्दे पर बहस के दौर
27:29
चले आखिरकार सल्तनत को 12 सूबों में बांटा गया हर सूबे में एक सूबेदार
27:36
रखा जमीन की नाब जोग के लिए हमने एक ही कानून
27:42
बनाया इससे फायदा यह हुआ कि किसानों को कारिनो की मेहरबानी पर जीना नहीं
27:48
पड़ा इस तरह खेती की तरक्की के लिए हमने किसानों को बढ़ावा दिया इससे राजस्व में
27:55
वृद्धि हुई और हुकूमत की बढ़ी यह जरूर है कि यह सब करने में बरसों
28:01
लगे मगर इससे सल्तनत को एकजुट रखने में काफी मदद मिली हम गुजरात के रास्ते से
28:08
अपनी फौज का बठ रहे हैं हम चाहते हैं कि वहा जल्द से जल्द हालात सुधर जाए हुजूर हम
28:14
अपनी फौजों को वापस नहीं बुला सकते उठे मेवा सेना को खतरो है मौका पाते ही राणा
28:21
प्रताप हम पर टूट पड़ेगा राणा प्रताप सिंह राणा और उसके चंद सिपाही जब चाहे हमारी
28:29
सल्तनत की फौज पर हमला कर सकते हैं ये शर्म की बात नहीं है राणा अभी तक हमारे दरबार में हाजिर
28:36
क्यों नहीं हुआ हुजूर वो अपना बेटे ने भेजने को तैयार है हमें उसके बेटे की जरूरत नहीं है हमारी ख्वाहिश है कि वो खुद
28:44
हमारे सामने हाजिर हो राजा मान सिंह हुकम आप हमारे दूध बनकर
28:52
उसके पास क्यों नहीं जाते आप नहीं जीमें
29:00
मानसिंह मैं थारा आदर सत्कार किया यही बहुत है अब थारे संग भोजन करके जात को
29:07
नहीं बिगाड़ा ऐसा क्यों सोचे हो राणा प्रताप तुम्हें को नहीं मालूम तो राजपूत
29:13
स्त्री ने मले को बहे है दास बनके उनकी चाकरी करे है फिर भी तुझे को नहीं मालूम
29:21
राणा जी मैं यहां बारा दूतर हैसियत से ठे आया हूं निजी झगड़े वास्ते पास समय को
29:28
नहीं मान सिंह ज ार बादशाह मने संदेश देन चावे है तो खुन चाहिए आपने मालूम है आप
29:36
क्या कह रहे हो उने भेजे भी तो एक छोटा आदमी ने दूध बना के जि पूरा खानदान मार चा
29:44
कर है राणा साफ कहू मैं यहां अपनी अब बासा हुजूर बेज्जती सहन करने को नहीं आया कंडरा
29:52
बादल से बाहर आ और पा सारा हुकम का पालन करके फौरन उसके सामने हाजरी बजाओ
29:58
जर आपने ऐसा नहीं किया तो इसे बगावत समझी जावेगी और सल्तनत फौज हमला करके बेवा पर
30:05
कब्जा कर लेगी मानसिंह उनसे कह दे मेवाड़ कभी अकबर सामने
30:11
सेर नहीं झुका वेगा मारा सब रिश्तेदार उन नौकर बन गया है पर मैं ऐसा को नहीं कर
30:17
सकता आपने पूर्वज महान परंपरा सु मैं विश्वास घात को नहीं कर सकता राणा
30:25
जी आप सोच हो कि हम बात सी सेवा क्यों कर रहे हैं कारण कि थे सब देशद्रोही हो कायर
30:33
हो कायर नहीं बल्कि इस वास्ते कि हम सल्तनत की ताकत को समझे और हम यह भी जाने
30:40
हैं कि सल्तनत का हिस्सा बन के रहोगे तो तुम्हारे पास ज्यादा ताकत होगी स्वतंत्रता होगी थे सब दास हो दास और दास कद भी
30:49
स्वतंत्र नहीं हो सके मान सिंह कद भी स्वतंत्र नहीं हो सके राणा जी आप बीते जमाने में जी रहे हो
30:56
आपरा स्वतंत्र सारा विचार आज समय से मेल को नहीं खावे स्वतंत्रता स्वतंत्रता के
31:02
स्वतंत्रता की बात करे हो आपनी जमीन सारी बंजर व्यापार रिवाज से आपने पास कुछ नहीं
31:08
आप और आपरा पूर्वज हमेशा लूटपाट पर जिंदा रहा है और जब सल्तनत आपने दरवाजे पर दस्तक
31:14
दे है तो लूटपाट भी आप वास्ते मुश्किल हो गया मारी बात मान लो और सल्तनत से मिल
31:21
जाओ आपको हर चीज में हिस्से मिलोगे अनाज व्यापार राजस् सान शौकत हर चीज में हर चीज
31:29
पर सम्मान को नहीं और सम्मान बिना ये सब धुरी बराबर हो मान सिंह धुरी बराबर आप
31:35
सम्मान कोई नहीं चिन रहे हो राणा जी आप ही बताओ हमारे परिवार के सम्मान में के कमी
31:41
हुई है थारे खानदान में जिन सम्मान में स्वीकार क है उन हर राजपूत और सिर शर्म से
31:47
झुक गयो है ऐसा है तो सारे राजपूत मारे जयपुर रे संगीत काव्य पूजा पाठ परंपरा का
31:53
अभी तक पालन क्यों कर रहे हैं ज तुम्हारा अपमान सल्तनत द्वारा किया गया होता तो ऐसा
31:58
क्यों है राणा जी सच्चाई ने समझ वारे की कोशिश करो अकबर बादशाह सम्मान रो असली मतलब समझे
32:06
हैं जब ऐसा ना हो तो हम उन्हे इतना महत्व भी ना देवे कुछ भी कहो मानसिंह मार वास्ते
32:13
तू एक कायर बेशर्म और देशद्रोही है बर कभी
32:19
उ रास्ता पर नहीं चल सके जो तू बता र है तो ठीक है आप प्रण संदेशा में बादशा ने पहुंचा द
32:29
पर जाते जाते एक सला दे आप युद्ध तैयारी करके
32:35
ख सब ज पा नीने पानी पियो ज बैठो थ जमीन
32:45
लो मैं नहीं चाहू की मेवाड़ को जैसे देशद्रोही
32:52
लगे ज बाने पता लायो कि राणा प्रताप ने मारी बेज्जती की है और हाजिर होने से
32:58
इंकार कर दियो है तो उन्होंने हुकम दियो कि मैं सल्तनत फौज लेकर मेवाड़ पर चढ़ाई कर दूं मारे साथ बीकानेर और बूंदी रा
33:06
राजकुमार था राणा प्रताप के संग भील आदिवासी और दिल्ली पर अपनी हुकूमत ख्वाब
33:13
देखने वाला अफगानी रा खिचड़ी तल राणा प्रताप ने साकरी हल्दी घाटी के
33:18
मुहाने पर अपना जमाव का राख था जिनसे वह हमारी फौज ने पीछे धकेलने में कामयाब
33:24
र उस रोज माने लगयो कि हम हार गए हैं पर राणा जी ने भी एक भूल कर दी लड़ाई रा जोस
33:31
में आके उन्होंने अपनी जगह छोड़ समतल पर आ गए फिर क्या राजपूतों के हारने में देर
33:38
कोनी लागी राणा जी को मैदान छोड़कर भागन पड़
33:44
फिर बरसों तक व मारे रास्ते रा काटा रया पर उन्होंने बास के सामने सर कोनी झुका उन
33:51
द निश्चय और साहस देखकर बादशाह ने उन्हें सताना बंद कर दिया और मेवाड़ पहाड़ियों
33:57
में भटक वाले वास्ते छोड़ दिया कुछ रसों बाद पता लग गयो कि राणा जी
34:04
की मृत्यु हो गई उस रोज ऐसा लागयो कि मारे शरीर का कोई हिस्सा खो गयो
34:10
है दुख री बात यह है कि उस जैसा साहसी और
34:16
गोड़वाना री रानी दुर्गावती जैसे स्वाभिमानी शासकों को भगोड़ा होकर मरन
34:21
पड़ो पर बाद सारा विरोध करके एक तरह से उन्होंने अपना दुर्भाग्य स्वयं चु
34:29
था शेख मुबारक आप यहां नहीं बैठ सकते आपको
34:34
यहां भी दरबार के कायदे से ही बैठना चाहिए अब्दु नबी सही फरमा रहे हैं मुझे लगता है
34:40
उल हजरात अगर मक्के शरीफ की तरफ रुख करके बैठे तो ज्यादा बेहतर होगा यह दरबार नहीं है बदायुनी नहीं इन्ह यहां नहीं बैठना
34:48
चाहिए देखो यहां बैठना ठीक नहीं इस जगह पर सयद का हक
34:54
है वो रसूल के खानदान से है ऊंचा दर्जा है उनका क्या बादशा से भी ऊचा ी बातें मत करो
35:01
फजल अपने वालिद से कहो अपना गिरेबान ंक कर देखें एक नाचने गाने वाले दरवेश से भी गए
35:09
गुजरे हैं यह सब्र करिए जनाब बाशा सलामत को तशरीफ लाने दीजिए वो
35:15
खुद फैसला करेंगे ठीक है तब तक इस बारादरी में कोई नहीं बैठेगा अरे वाह आप लोगों ने
35:21
तो बहस में बहसा शुरू भी कर दिया हुजूर हमारी ब का मुद्दा यह है कि इस
35:29
बारादरी में बैठने की तरतीब क्या हो तशरीफ रख
35:40
आप हुजूर कारवाई शुरू करने से पहले एक अर्ज करनी है कि एक संगीन मुद्दा दरपेश है
35:47
बाद में पहले हम आपको यह बता द कि हमने आपको यहां क्यों बुलाया
35:55
है एक अरसे से ये सवाल हमें सता रहा है कि एक बादशाह की
36:01
जिंदगी का मकसद क्या सिर्फ लड़ाइयां जीतकर ताकत हासिल करना ही
36:07
है हम एक अरसे से जिंदगी और मौत को समझने
36:12
और खुदा जो इनका मालिक है उसको जानने की कोशिश में लगे हुए
36:19
हैं और जब भी हम मजहबी दानिशमंद से बात करते हैं तो भरम और भी बढ़ जाता है एक
36:26
फिरका कहता है कि ऐसा होता है दूसरा कहता है कि ऐसा नहीं होता है ब आप ही
36:33
बताइए कि खुदा की राह में भटकने वाले इंसान को इससे कितनी तकलीफ होती
36:39
होगी इसीलिए हमने फैसला किया है कि हर जुमा रात को हम और तमाम मजहब के दानिश मन
36:47
यहां इकट्ठा होंगे और सच्चाई को समझने और उस तक
36:53
पहुंचने की कोशिश करेंगे वाह पर मेरी एक हर्ज है
36:59
आपसे जज्बात को अपने दिमाग और फैसलों पर
37:05
हावी ना होने दें वाह तो फिर आज से इस खूबसूरत बारादरी को
37:12
इबादत खाना कहेंगे हुजूर वो बैठने के इंतजाम के बारे
37:17
में दरबार में जो आपका ओहदा है वो यहां मायने नहीं रखता यहां आप दरबारी नहीं है लेकिन हुजूर
37:25
इसका फैसला हम पहले कर चुके हैं
37:30
[संगीत] मैं पूछता हूं बैठने का सारा इंतजाम पहले
37:38
से क्यों नहीं किया गया कम से कम उलेमा के बैठने के लिए खास जगह मुकर्रर होनी चाहिए लेकिन बादशाह
37:45
सलामत है इनसे कहे कौन और उलेमा की यह तहीन बादशाह की बुत
37:50
परस्तों से दोस्ती का नतीजा है और मुझे नहीं लगता है कि इस तरह की मजलिस में बैठकर बहस करने से सच्चे ईमान का कुछ भी
37:56
भला होगा बाद में हुआ यह कि मजहब के हर पहलू को
38:02
लेकर झगड़े की हद तक बहस होती रही लेकिन एक आम राय फिर भी कायम नहीं हो पाई अक्सर कई सवालों पर बादशाह को मुतमइन
38:10
करने की जिम्मेदारी मुझे दे दी गई ब नहीं आपकी क्या राय है उलेमा तो एक आम राय कायम
38:18
नहीं कर पा रहे हैं इस्लाम क्या मुता की इजाजत देता है
38:23
हुजूर यह काजी साहब पर मुनसर करता है अगर काजी साहब उस फिरके से ताल्लुक रखते
38:30
हैं जहां के मुता की इजाजत है तोसे कानून सही मान लिया
38:35
जाएगा वरना मुता शरीयत के कायदे के खिलाफ है वाह खूब क्या सीधा और साफ जवाब है
38:43
शाबाश बदायुनी [संगीत]
38:49
इसके बाद बादशाह के दिल में मेरे लिए जगह बन गई और फिर तो व अक्सर मुझसे मशवरा करने
38:56
लगे नतीजा यह हुआ कि वो बेदीन अबुल फजल मुझसे
39:01
जलने लगा व बुध परस्तों की तरफ बादशाह का जो गलत झुकाव था उसको बढ़ावा देने लगा जैन
39:08
हिंदू यहां तक के जरथ भी इबादत खाने की बहस में शामिल होने लगे इन काफिर से हमें अपने दन की हिफाजत
39:15
नहीं करनी चाहिए थी और फिर एक दिन सुनने में आया कि बादशाह
39:21
जट की तरह आतिश परस्त भी हो गए हैं उमा पर बढ़ने लगे एक दिन बादशाह ने
39:29
खुद आलिम अब्दुल नबी की मुखालिफत की जब अब्दुल नबी ने एक ब्राह्मण को रसूल के खिलाफ बोलने पर सजाए मौत सुनाई हनफी कानून
39:37
में साफ कहा गया है कि अगर कोई काफिर जिसने खुद को मुस्लिम हुक्मरान के सुपुर्द कर रखा है रसूल की तौहीन करे तो हुक्मरान
39:46
को रियाया की हिफाजत की जिम्मेदारी से छुट्टी नहीं मिल जाती शेख अब्दु नबी अबू
39:51
हनीफा के फ से वाबस्ता है फिर क्यों अपनों के खिलाफ हो रहे हैं मुमकिन है उस ब बरन
39:58
को फांसी का हुक्म सुनाते वक्त अब्दु नबी इस कायदे से वाकिफ ना हो मगर क्या वो अभी
40:04
भी वाकिफ नहीं हुए वह खुद यहां मौजूद होते तो सवाल का बेहतर जवाब दे पाते हुजूर नहीं
40:11
जवाब आपको देना है आप लोग कानून और ईमान को जानने का दावा जो करते
40:19
हैं हुजूर शेख अब्दुल नबी एक आलिम इंसान
40:25
है जरूर कोई वजह रही होगी जो उन्होंने रवायत के खिलाफ ऐसा फैसला सुनाया है शेख
40:31
मुबारक आप मुझे मशवरा दीजिए कि मैं उलमा के साथ कैसे पेश आऊ मैं उन्हे कैसे समझाऊ
40:38
कि कानून का इस्तेमाल किसी एक मजहब के फैलाव के लिए करना ठीक नहीं है बादशाह
40:44
सलामत आप इस दौर के रहनुमा है सुधारक हैं आला पेशवा है किसी भी मामले में हुक्म
40:52
जारी करने के लिए उलेमा की जरूरत नहीं आपको ऐलान करना चाहिए
40:58
आप शरीयत के आखरी फैसला कुन है उलमा से एक खत ले लीजिए जिसमें इस बात की तस्दीक की
41:05
गई हो हिंदुस्तान के किसी भी बादशाह ने पहले कभी ऐसा किया है जी हुजूर सुल्तान
41:12
अलाउद्दीन खिलजी
41:24
ने हाजरी है खुदा की
41:30
मेहरबानी जो मुझे शाही मिली जोर बाजू को मिला और दिल को दाना
41:37
मिली अदल और ईमान का रास्ता दिखाया काम में रहनुमाई की मेरी इंसाफ में नाम
41:46
में क्या बया हो उसकी रहमत अकल से वाला है
41:51
वो शान है जिसकी जलाली अकबर आला है वो
41:58
हाजरी दुआ कीजिए
42:50
क्यों आप पैगंबर ईसा को खुदा मानते हैं क्या वो इंसान नहीं वो इंसान भी है और
42:58
खुदा भी उनकी रास्ते पर चलकर हम धर्म की ताकत
43:05
बढ़ा सकते हैं मगर एक बात बताइए आप शादी ना करके आदम से शुरू हुए
43:14
जन्म के सिलसिले को रोक नहीं रहे अब सच सच बताइए आपकी कभी ख्वाहिश नहीं
43:21
हुई कि आपके अपने बच्चे हो यह कहना गलत है कि हमारे बच्चे नहीं है
43:28
जिन्हें हम ईसा का उपदेश सिखाते हैं वे सब हमारे बच्चे बन जाते हैं वे उन बच्चों से
43:37
कम नहीं जो शरीर से पैदा होते हैं अगर आप
43:42
रुडोल्फो और मेरे सब बात मानकर ईसाई धर्म को कबूल कर ले तो आप
43:51
हमारे बेटे हो गए हुमायू के नहीं जो हम मां बाप मानते वे सिर्फ एक
43:58
शरीर को जन्म देते हैं लेकिन जो आपको ईसाई बनाता वह शरीर में
44:07
आत्मा को जन्म देते हैं इसीलिए हम कहते हैं कि माफ
44:14
कीजिए मैं आपकी बात को मानने को तैयार नहीं मेरे ख्याल से हर मजहब के अपने रीति
44:21
रिवाज है हिंदू मुस्लिम ईसाई पारसी यहूदी
44:27
सभी मबों की अपनी खास तालीम हैं न फिर भी अजीब बात है कि एक खास मजहब
44:35
को मानने वाला अपने मजहब को दूसरों के मजहब से ऊंचा समझता है ज्यादा इज्जत देता
44:42
है बल्कि यही नहीं व दूसरों पर दबाव डालता है कि उसी के मजहब को कबूल करें जो ऐसा
44:49
नहीं करते उसे सिर्फ नीची नजर से ही नहीं देखता अपना दुश्मन भी मानता
44:55
है यही सब बात हैं जो मेरे दिलो दिमाग में शुभ पैदा करती
45:00
है जनाब मैं तो ज्यादा से ज्यादा इल्म हासिल
45:05
करना चाहता हूं ताकि आप मेरी बात समझ रहे हैं
45:11
ना जैसे आपकी मर्जी जनाब इस जवाब के साथ ईसाई धर्म के फैलाव
45:20
के लिए हमारे य आने का मकसद ही खत्म हो गए
45:25
है मुझे ता है बादशाह कोई सच्चा धार्मिक
45:30
खोज में हमें यहां नहीं बुलाए लेकिन सिर्फ कुछ नई नई बातें जानने के
45:36
लिए या फिर हमारी आत्मा पर छोट करने का एक
45:42
शरीफ आना अंदाज था या शायद यशु का मर्जी
45:52
नहीं आज का दिन एक बहुत ही खास दिन है
45:58
मैंने आप सबको इसलिए यहां बुलाया है क्योंकि आप सब मेरे दिल के बहुत करीब
46:11
[संगीत]
46:20
हैं आप समझ सकेंगे कि मैं जिस दीन इलाही का ऐलान करने
46:27
जा रहा हूं उसके माने क्या
46:34
है राजा मान सिंह जी आप इस तीन इलाई के शागिर्द कबूल करना
46:43
पसंद करेंगे हुजूर मैं तो अपनी जान हमेशा हथेली पर रखकर चलता हूं शागिर्द का रसू
46:50
बड़ा प्रमाण को नहीं दे सके पर जब इसका मतलब कोई और धर्म से है तो एक बात साफ है
46:57
मैं हिंदू हूं पर आप हुकम करो तो मुसलमान भी हो जाऊंगा इन दो धर्म को छोड़ मारे को
47:04
और कोई धर्म को नहीं दिखे राजा मान
47:10
सिंह डरने की कोई बात नहीं तीन इला को कबूल करने के
47:16
लिए किसी किस्म का दबाव या जबरदस्ती नहीं
47:23
है फिर भी आपका जवाब सुनकर ऐसा लगा कि इस नए मजहब के बारे में लोगों के दिमाग में
47:28
गलतफहमी है दीन
47:34
इलाही सिर्फ एक इंसानी फर्ज है मैं तो यहां तक कहूंगा कि हर बादशाह के
47:42
लिए इंसाफ और अपनी राया के लिए बेहतरी से बढ़कर कोई इबादत नहीं
47:48
वा तकरार तब शुरू होती है जब हुक्मरान
47:54
हुकूमत के मसलों को नजरअंदाज करके र मामलों में उलज जाते
48:01
हैं जी जनाब खुदा और ठीक वैसे ही जब कोई मजहबी सल्तनत
48:08
के मामलो में हिदायत देने लगता है हम नहीं चाहते कि हमारी सल्तनत कदाम
48:14
परस्ती का शिकार बन जाए और उसका इस्तेमाल सिर्फ किसी एक खास मजहब की तरक्की के लिए
48:20
किया जाए जब ऐसा होता है तो सल्तनत की तरक्की नहीं हो सकती
48:27
तब भी नहीं होती जब हुक्मरान मजहब और सियासत के बीच में झूलने
48:33
लगता है आपने
48:38
ठीक इसलिए हम यह तीन इलाही का ऐलान कर रहे
48:44
हैं इसको कबूल करने वाले के लिए चार चीजों की कुर्बानी देना जरूरी है और वो चार
48:52
चीजें ऐसी है जिनसे आम लोग बेहद मोहब्बत करते
49:01
हैं बताओ अबुल फजल ने इलाही कबूल करने वालों को अपनी तमाम जायदाद जिंदगी शोहरत
49:10
और अपने अकीदह के नाम कुर्बान करने को तैयार होना
49:16
चाहिए तो बताइए आप में से दीन इलाही का पहला मुकद
49:22
कौन बनना चाहता है हुजूर क्या श मुझे हासिल होगा
49:31
[संगीत]
49:59
बरसों तक अकबर ने अनेक धर्मों के आलिम और आचार्यों से अपने बहस मुबा से जारी रखे
50:05
यहां तक कि वह सब उससे उकता गए और उन्होंने अकबर को अपने मत में मिला देने की आशा भी छोड़
50:12
दी जब हर एक मजहब में सच्चाई का कोई पहलू था तो अकबर किसी एक को तरजीह कैसे
50:20
देता उसका मकसद क्या था यह साफ तरह जाहिर नहीं होता क्या वह इस सवाल को सिर्फ
50:25
सियासी नजरिए देख रहा था एक साझी कमि की खोज में क्या वह
50:32
मुख्तलिफ मजहब को एक ही धारे में मोड़ना चाहता था या उसकी तलाश का मकसद रूहानी था
50:39
मैं कह नहीं सकता लेकिन मेरा अपना ख्याल है कि उसका रुझान एक धार्मिक सुधारक से ज्यादा एक
50:47
सियासत द का था अकबर ने अपने अतरा ऐसे गुणी जनों का
50:52
हल्का जमा किया जो उसकी जात और उसके आदर्शों से लगाव रखते थे उसका दरबार सारे
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मजहब का गहवारा बन गया और उन सब लोगों का जो किसी नए ख्याल या तरीके में दिलचस्पी
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रखते थे उसके दौर में उत्तर भारत में हिंदू मुस्लिम तहजीब इत्तेहाद ने बहुत तरक्की की
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अकबर खुद हिंदुओं में भी उतना ही मशहूर था जितना मुसलमानों में इस वजह से मुगलों का
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राजवंश हिंदुस्तान में जड़ पकड़ गया और यही का कहलाया
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[संगीत]
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