0:01
आज बहुत ही भयानक और कतई भीषण किस्म का आज
0:05
हम भाई टॉपिक ले आए हैं। कॉन्ट्रैक्ट्स पे
0:10
यह सबसे इंपॉर्टेंट सब्जेक्ट है। जहां
0:13
कोर्ट्स सिर्फ वर्ड्स को नहीं मीनिंग
0:15
इंटरप्रेट करती है। सो हाउ डस अ
0:18
कॉन्ट्रैक्ट कम टू लाइफ व्हेन इट कम्स टू
0:19
कोर्ट्स? आज हम यह समझेंगे। तो बिना किसी
0:23
भसड़ के आज की वीडियो शुरू करते हैं।
0:31
देखो भाई हर लीगल डॉक्यूमेंट वर्ड्स में
0:35
लिखा होता है। लेकिन सिर्फ वर्ड्स ही लीगल
0:38
आउटकम डिसाइड नहीं करते। और मैक्सिमम लोग
0:41
चाहे लेमनैन हो या चाहे लीगल प्रोफेशनल्स
0:43
हो इस बात को क्यों भूल जाते हो मुझे समझ
0:47
नहीं आता। अपनी डिग्री जला दो।
0:50
लीगल आउटकम डिसाइड करती है कोर्ट्स और जब
0:54
कोर्ट किसी स्टट्यूट या कॉन्ट्रैक्ट के
0:56
टेक्स्ट को इंटरप्रेट करती है तो सिर्फ
0:59
ग्रामर नहीं देखती सिर्फ डिक्शनरी मीनिंग
1:04
कोर्ट्स एक्चुअली टेक्स्ट स्ट्रक्चर
1:07
कॉन्टेक्स्ट परपस इफेक्ट सब कुछ वे करती
1:15
इंटरप्रिटेशन एक मैकेनिकल प्रोसेस नहीं
1:18
होता। लेकिन ये तुम कब समझोगे और मुझे भी
1:21
भैंस के आगे भागवत करने का इतना शौक है तो
1:25
इंटरप्रिटेशन जजमेंट इन एक्शन होता है।
1:30
इसी बात को सुप्रीम कोर्ट ने एक बहुत
1:32
इंपॉर्टेंट केस में हाईलाइट किया था।
1:35
अनाया कोचा शेट्टी वर्सेस लक्ष्मीबाई
1:40
यह केस इनिशियली एक नॉर्मल कमर्शियल
1:42
डिस्प्यूट लग रहा था। लेकिन धीरे-धीरे
1:45
धीरे-धीरे यह एक फाउंडेशनल जुरिस
1:47
प्रोडेंशियल क्वेश्चन बन गया कि कोर्ट्स
1:49
मीनिंग कैसे कंस्ट्रक्ट करती है रिटन
1:51
डॉक्यूमेंट से। अब बहुत सारे टाइप्स ऑफ
1:53
इंटरप्रिटेशन है। आपने अपने लॉ स्कूल में
1:54
पढ़ा होगा और नहीं भी पढ़ा है। अगर तुम
1:57
लॉयर नहीं भी हो तो हम क्यों बैठे हैं?
1:58
बता देते हैं यहीं पे।
2:01
इस केस का डिसीजन सिर्फ इस बात पर बेस्ड
2:04
नहीं था कि डॉक्यूमेंट में क्या लिखा था।
2:06
बल्कि उसका स्ट्रक्चर क्या था? कौन सी चीज
2:09
इंटेंशनली मिसिंग थी? कमर्शियल सेटिंग
2:12
क्या ये सब चीजें आउटकम इंपॉर्टेंट था
2:15
लेकिन इंटरप्रिटेशन का मेथड और भी ज्यादा
2:18
इंपॉर्टेंट था। देखो जब कोई
2:20
कॉन्स्टिट्यूशनल क्वेश्चन आता है तो बेसिक
2:22
डॉक्ट्रिन बेसिक स्ट्रक्चर को भी याद करते
2:24
हैं और ये भी कई बार याद किया जाता है कि
2:26
जो कॉन्स्टिट्यूशन फ्रेमवर्स हैं उन लोगों
2:28
ने किस इंटेंशन से इसे बनाया उस पर्टिकुलर
2:30
चीज को किस इंटेंशन से लिखा?
2:33
पहले ये केस का बैकग्राउंड बता देता हूं।
2:36
ये कमर्शियल एग्रीमेंट से लीगल फिलॉसफी तक
2:38
कैसे आ गया? 1971 में एक
2:42
कंडक्टिंग एग्रीमेंट साइन हुआ था। एपिलेंट
2:47
रेप्लेंट अनाया कोचा शेट्टी और
2:50
रिस्पॉनडेंट डिफेंडेंट पकड़ लो लक्ष्मीबाई
2:53
नारायण सब्स एग्रीमेंट के अंदर
2:57
एग्रीमेंट के अंदर एपिलेंट एक होटल
3:00
प्रॉपर्टी कंडक्ट करता था। प्रॉपर्टी ओनर
3:03
रिस्पोंडेंट थी। काफी सालों तक होटल ऑपरेट
3:07
हुआ। बाद में अपीलेंट ने क्लेम किया मैं
3:12
डीम्ड टेनेंट हूं। बॉम्बे एरेंट एक्ट 1947
3:16
के अंडर मुझे टेनेंसी प्रोटेक्शन मिलनी
3:19
चाहिए। रिस्पोंडेंट ने कहा ये सिर्फ एक
3:22
कंडक्टिंग एग्रीमेंट है ना कि लीज़ है ना
3:25
लाइसेंस है। लीज़ एंड लाइसेंस तो है ही
3:27
नहीं। तो लोअर कोर्ट्स का जो अप्रोच था
3:29
स्माल कॉस्ट कोर्ट बॉम्बे की अगर हम बात
3:32
कर रहे हैं तो सीसी ने अपने एपिलेंट के
3:35
फेवर में डिसीजन दिया। कोर्ट ने क्या
3:37
देखा? एग्रीमेंट का टाइटल एक्चुअल ऑपरेशनल
3:40
कंट्रोल ओरल और डॉक्यूमेंट्री एविडेंस। तो
3:42
कोर्ट ने कहा ये सिर्फ पेपर एग्रीमेंट
3:45
नहीं है। प्रैक्टिकली एपिलेंट पोज़ेशन और
3:48
कंट्रोल में था। इसीलिए एपिलेंट को डीम्ड
3:50
टेनेंट या प्रोटेक्टेड लाइसेंस ही माना
3:52
गया। अब एपिलेट बेंच और बॉम्बे हाई कोर्ट
3:56
की बात अगर करें तो एपिलेट बेंच और हाई
3:58
कोर्ट ने एससीसी का डिसीजन रिवर्स कर
4:02
स्माल कॉस्ट कोर्ट का उन्होंने हैवी
4:05
रिलायंस की सेक्शन 91 एंड सेक्शन 92 ऑफ द
4:08
इंडियन एविडेंस एक्ट तो चलो अलग है बट 91
4:11
सेक्शन 91 और 92 की उन्होंने बात की लॉजिक
4:14
ये था डॉक्यूमेंट अपने आप में बोलेगा बाहर
4:18
के ओरल क्लेम से टैक्स चेंज नहीं होगा
4:21
कोर्ट ने एग्रीमेंट को सिर्फ कंडक्टिंग
4:23
एग्रीमेंट माना लीज नहीं माना लाइसेंस
4:26
नहीं माना सुप्रीम कोर्ट का फिर फाइनल
4:29
वर्ड आया सुप्रीम कोर्ट ने एपीलेट व्यू को
4:31
अफर्म करा पिक्स कोर्ट ने एफसाइज करा यानी
4:34
अपने सुप्रीम कोर्ट ने कि जनाब डॉक्यूमेंट
4:36
का टेक्स्ट उसका कॉन्टेक्स्ट पार्टीज का
4:40
कंटेंपरेनियस कंडक्ट और एक बहुत
4:43
इंपॉर्टेंट ऑब्जरवेशन दी
4:46
पेनेंसी का क्लेम तब फेल हो जाता है जब
4:49
एक्सक्लूसिव पोज़ेशन ट्रांसफर करने का
4:52
क्लॉज़ ही नहीं हो। मतलब अगर एग्रीमेंट में
4:57
पोज़ेशन ट्रांसफर का क्लॉज़ नहीं है तो
5:00
कोर्ट खुद से टेंडेंसी क्रिएट नहीं
5:05
यह तो चलो केस की बात हो गई। अब मैं तुमको
5:07
सीधा आम भाषा में बताता हूं इंटरप्रिटेशन
5:09
का कोर प्रिंसिपल क्या है? देखो चाहे
5:12
स्टट्यूट हो या कॉन्ट्रैक्ट हो।
5:13
इंटरप्रिटेशन का स्टार्टिंग पॉइंट होता है
5:16
डॉक्यूमेंट का मतलब वही होता है जो वो
5:19
कहता है। लिटरल कह सकते हैं। लेकिन
5:22
प्रैक्टिकली लैंग्वेज कभी वैक्यूम में काम
5:25
नहीं करती। वर्ड्स को कॉन्टेक्स्ट मिलता
5:27
है फैक्ट, स्ट्रक्चर और पर्पस से। इसीलिए
5:31
कोर्ट्स का काम होता है सिर्फ यह नहीं
5:33
देखना कि टेक्स्ट क्या बोल रहा है बल्कि
5:35
ये भी देखना कि लॉ क्या प्रोटेक्ट करना
5:38
चाहता है। पार्टीज क्या अचीव करना चाहती
5:41
हैं। तो जहां पे इंटरप्रिटेटिव फ्रेमवर्क
5:44
की लिटरल गोल्डन और परपसिव रूल आ जाए तो
5:47
कॉमन लॉ सिस्टम में कोर्ट यूजुअली एक
5:49
फ्रेमवर्क फॉलो करती है। लिटरल रूल गोल्डन
5:52
रूल या तो कॉन्टेक्स्चुअल इंटरप्रिटेशन।
5:55
हां इसको पर्पसिव भी कह लो।
5:58
यह कोई रिजिड हरार्की नहीं है। यह एक
6:00
मेथोडोलॉजिकल प्रैक्टिस है बंधनों। जैसे
6:02
अनाया शेट्टी केस में हमने ये दिखाई दी
6:06
थी। लिटरल रूल सबसे पहला स्टेप है। लिटरल
6:10
रूल कहता है वर्ड्स को उनके प्लेन
6:12
ग्रामेटिकल ऑर्डिनरी मीनिंग में समझा जाए।
6:15
अगर लैंग्वेज क्लियर है, अन्बिगस है तो
6:19
कोर्ट आगे जाकर कुछ ऐड नहीं करेगी।
6:22
इसका बेसिस है लीगल सर्टेनिटी पार्टी
6:25
ऑटोनोमी लेजिसलेटिव सोवनिटी केस में
6:28
एप्लीकेशन सुप्रीम कोर्ट ने देखा
6:30
एग्रीमेंट में पोज़ेशन ट्रांसफर का क्लॉज़
6:34
ही नहीं है इसलिए बोला टेंडेंसी क्रिएट
6:36
नहीं हो सकती कोर्ट का क्लियर स्टैंड था
6:38
कोर्ट कोर्ट्स राइट्स क्रिएट नहीं कर सकती
6:41
जो टेक्स्ट में दिए ही नहीं गए हैं तो
6:44
कैसे क्रिएट करेगी ऐसे ही दिल्ली हाई
6:47
कोर्ट में जनरल रेल केस यूनियन ऑफ इंडिया
6:49
वर्सेस जनरल रेल इंफ्रास्ट्रक्चर का आपको
6:51
पता होगा कोर्ट ने यहां बोला था कोर्ट
6:53
कमर्शियल सेंस से इंटरप्रिटेशन कर सकती है
6:55
लेकिन कॉन्ट्रैक्ट रीराइट नहीं कर सकती।
6:58
सिर्फ इसलिए कि कॉन्ट्रैक्ट एग्जीक्यूट
7:03
एक पार्टी इनकन्वीनियंस फेस कर रही है। तो
7:06
जुडिशियल इंटरप्रिटेशन इज नॉट इक्वल टू
7:09
जुडिशियल रिकंस्ट्रक्शन।
7:11
कोर्ट का रोल है कंसेंससेस एट इड मतलब
7:13
क्या? मीटिंग ऑफ माइंड्स को ऑनर करना। तो
7:17
कंसेंसिस एट इड को ऑनर करना। कमर्शियल
7:21
विज़डम इंजेक्ट करना नहीं है। गोल्डन रूल
7:24
की बात करें तो एब्सोर्डिटी से बचने का
7:26
टूल है। कभी-कभी लिटरल इंटरप्रिटेशन एब्स
7:29
रिजल्ट दे देता है। कमर्शियली इररेशनल हो
7:31
जाता है। तब कोर्ट्स अप्लाई करती है
7:32
गोल्डन रूल ऑफ़ इंटरप्रिटेशन। इसका ओरिजिन
7:34
हुआ था ग्रे वर्सेस पियर्सन में। अब वो
7:37
पढ़ते रहना बैठ के। प्रिंसिपल क्या है?
7:40
ऑर्डिनरी मीनिंग फॉलो करो। लेकिन अगर
7:42
ऑब्जर्डिटी आए तो अगर ऐसा कुछ आवे तो
7:47
सिर्फ उतना मॉडिफाई करो जितना नेसेसरी है।
7:50
एपेक्स कोर्ट ने इसे रेफर किया था मिस इरा
7:53
वर्सेस स्टेट एनसीटी ऑफ़ दिल्ली में। तो
7:56
अनाया शेट्टी केस में कोर्ट ने कमर्शियल
7:58
नेचर देखिए अब्जर्व एजमशन यानी टेनेंसी
8:02
विदाउट पोज़ेशन अवॉइड की। ये गोल्डन रूल का
8:05
सटल एप्लीकेशन है। बहुत सल में है। अब अगर
8:08
परपसिव अगर परपसिव इंटरप्रिटेशन की बात
8:11
करें तो ऑब्जेक्टिव समझना
8:14
परपसिव अप्रोच ज्यादातर स्टट्यूट्स में
8:17
यूज़ होता है। लेकिन कॉन्ट्रैक्ट लॉ में भी
8:20
इंक्रीजिंगली यूज़ हो रहा है। इस अप्रोच
8:23
में कोर्ट देखती है एग्रीमेंट का पर्पस,
8:26
कमर्शियल बैकग्राउंड रिलेटेड डॉक्यूमेंट्स
8:30
केस में सुप्रीम कोर्ट ने क्या देखा?
8:33
रॉयल्टी पेमेंट, लॉन्ग टर्म अरेंजमेंट,
8:35
रेंट क्लॉज़ का एब्सेंस है, पोज़ेशन क्लॉज़
8:38
का एब्सेंस है। तो कंक्लूजन क्या था? ये
8:40
बिज़नेस कंडक्टिंग एग्रीमेंट था।
8:43
डिसगज़ लीस्ट थोड़ी थी। अब इसमें और एक
8:46
खतरनाक चीज आती है जिसको हम बोलते हैं
8:47
मिसिफ रूल। लॉ का प्रॉब्लम सॉल्व करना।
8:51
हेडेंस केस से ये ओरिजिन हुआ है। भाई साहब
8:53
चार सवाल है। लॉ पहले क्या था? प्रॉब्लम
8:55
क्या थी? रेमेडी क्या प्रपोज हुई? और
8:57
रेमेडी का ट्रू रीज़ क्या है? इंडियन
8:59
सुप्रीम कोर्ट ने अप्लाई किया था एक्स
9:02
वर्सेस प्रिंसिपल सेक्रेटरी हेल्थ
9:03
डिपार्टमेंट। कॉन्टेक्स्ट क्या था? पीटीएम
9:05
एक्ट को इंटरप्रेट करके अनमैरिड वुमेन को
9:08
सेफ अबॉर्शन एक्सेस देना।
9:11
तो सी वी आर टॉकिंग अबाउट अ हारमोनियस
9:13
कंस्ट्रक्शन। दैट इज़ एन इंटरनल
9:18
यह प्रिंसिपल इंश्योर करता है डॉक्यूमेंट
9:21
का कोई क्लॉज़ रिडंडेंट ना हो। सब
9:24
प्रोविज़ंस एक साथ काम करें। चाहे स्टट्यूट
9:27
हो या कॉन्ट्रैक्ट हो। एक क्लॉज़
9:29
एक्सक्लूसिव राइट्स देता हो, दूसरा
9:31
रेस्ट्रिकशंस लगाता हो।
9:34
फंडामेंटल राइट्स है, डू ड्यूटीज़ है, राइट
9:37
टू फ्रीडम ऑफ़ स्पीच एंड एक्सप्रेशन है तो
9:40
उसमें रेस्ट्रिकशंस भी है, लिमिटेशन भी
9:42
है। कोर्ट का काम दोनों को हार्मोनाइज
9:44
करना है। एक को डिस्ट्रॉय करना नहीं है।
9:47
अब यहां प्रिंसिपल ऑफ़ डिसगाइस भी आता है।
9:49
सब्सटेंट व्हिच इज़ यू नो सब्सटेंस
9:51
ओवरफॉर्म। कोर्ट्स का एक क्लियर स्टैंड
9:53
है। नाम से नहीं काम से कॉन्ट्रैक्ट जज
9:57
होता है। अगर पार्टीज रेगुलेटरी कंप्लायंस
10:02
से बचने के लिए लायबिलिटी हाइड करने के
10:05
लिए रियलिटी डिसगाइस करने के लिए फैंसी
10:07
लैंग्वेज यूज़ करती है तो कोर्ट्स उस
10:10
डिसगाइस को पियर्स कर देगी। अनाया शेड्टी
10:13
केस में एग्रीमेंट का काम कंडक्टिंग था।
10:16
कोर्ट ने पूरा सब्सटेंस एनालाइज किया और
10:19
कंक्लूड किया ना लीज ना लाइसेंस तो
10:23
स्टट्यूट और कॉन्ट्रैक्ट के इंटरप्रिटेशन
10:25
का डिफरेंस क्या है? स्टट्यूट्स पब्लिक एट
10:28
लार्ज के लिए होते हैं। लेजिस्लेचर की विल
10:31
रिफ्लेक्ट करते हैं। और कोर्ट टेक्स्ट
10:33
कोर्ट्स टेक्स्ट के चार दीवारों के अंदर
10:36
रहती है। कॉन्ट्रैक्ट्स का क्या है?
10:38
प्राइवेट ऑर्डरिंग का रिजल्ट होता है।
10:41
नेगोशिएशन प्लस कमर्शियल इंटेंट से बनते
10:43
हैं और कोर्ट्स ज्यादा कॉन्टक्स्ुअल
10:45
अप्रोच लेती हैं। तो कॉन्ट्रैक्ट लॉ में
10:49
कोर्ट्स टर्म्स इंप्ल्लाई कर सकती हैं।
10:51
रेक्टिफिकेशन कर सकती है, रीाइट नहीं कर
10:54
सकती। स्टट्यूट कंप्लीट नहीं किया जा
10:57
सकता। सिर्फ डिफाइन किया जा सकता है। तो
11:01
मैनिफेस्टेशन ऑफ इंटेंट की जो बातें
11:03
सेंट्रल थीम होती है। कोर्ट्स ये नहीं
11:05
पूछती कि पार्टीज ने दिल में क्या सोचा
11:09
था? मन में क्या सोचा था? कोर्ट्स पूछती
11:12
है पार्टीज ने बाहर दुनिया को क्या
11:16
समझ रहे हो? इंटेंट इनफोर्स तब होता है जब
11:21
रिटन टर्म, कंडक्ट, कोर्स ऑफ डीलिंग,
11:23
कमर्शियल कॉन्टेक्स्ट ऑब्जेक्टिव हो।
11:29
तो यहां पर पेल एविडेंस रूल आ जाता है।
11:32
मंगला वामन काराडिकार केस यह ध्यान अगर
11:35
आपको होगा नहीं है तो पढ़ना एक बार। इसमें
11:38
रूल था अगर कॉन्ट्रैक्ट लैंग्वेज क्लियर
11:40
है तो एक्सटर्नल एविडेंस अलाउड नहीं। रिटन
11:44
डॉक्यूमेंट इज इक्वल टू फाइनल एक्सप्रेशन
11:49
इन्वेस्टर्स कंपनसेशन स्कीम इसके पांच की
11:55
रीज़नेबल पर्सन टेस्ट फ़क्चुअल मैट्रिक्स
11:58
प्रायर नेगोशिएशन इज़ एक्सक्लूडेड लीगल
12:01
मीनिंग इज़ नॉट इक्वल टू डिक्शनरी मीनिंग
12:03
एंड प्लेन मीनिंग प्लस कमर्शियल सेंस
12:08
इंडिया में अप्लाई हुआ था Besc वर्सेस
12:11
कोनार्क पावर प्रोजेक्ट्स में
12:14
यहीं पे अगर बिनेस एफिकसी एंड अगर आप ऑफ
12:17
ऑफिशियस बाय स्टैंडर्ड की बात करो तो
12:19
कोर्ट्स कभी-कभी टर्म इंप्ल्लाई करती हैं।
12:22
जब कॉन्ट्रैक्ट्स वकेबल बनाना हो तो रीाइट
12:25
करने के लिए नहीं। देखो कॉन्ट्रैक्ट को जब
12:27
वकेबल बनाना हो तब यह चीज होगी। रीराइट
12:29
करने के लिए नहीं होगी। अगर बाय स्टैंडर्ड
12:32
सजेस्ट करता तो पार्टीज बोलती ऑफ कोर्स
12:35
सिंपल बात है। एमएमआरडी और यूनिटी इंफ्रा
12:38
प्रोजेक्ट बहुत बड़ा केस था। सबको मालूम
12:41
फिर यहां पर कॉन्ट्रा प्रोफेटम रूल भी आता
12:44
है। अगर ए्बिग्विटी बची ग्राफ्टिंग पार्टी
12:47
के अगेंस्ट इंटरप्रेट करो। एस्पेशली
12:49
इंश्योरेंस कंज्यूमर कॉन्ट्रैक्ट अनकल
12:52
बारगेनिंग पावर केसेस तो कोर्ट्स क्या
12:55
नहीं करेगी? सिंपल सी बात है। खत्म करते
12:57
हैं। कोर्ट्स कॉन्ट्रैक्ट रीाइट नहीं
12:58
करेगी और पार्टीज को मिशन फिक्स नहीं
13:00
करेगी। तो ड्राफ्टिंग रिससिबिलिटी तो
13:03
पार्टीज के ऊपर है। सिंपल सी बात है। लॉ
13:06
का जो रियल फेस है वो इंटरप्रिटेशन के
13:08
मामले में वहां होता है जहां लॉ जिंदा
13:10
होता है। जहां लैंग्वेज को मीनिंग मिलता
13:12
है। कोर्ट सिर्फ पढ़ती थोड़ी है। कोर्ट
13:14
रीज़ करती है। और इसी रीजनिंग से लॉ सिर्फ
13:18
एक्सिस्ट नहीं करता। लॉ एंडोर करता है। ये
13:21
समझना जरूरी है। और अगर आपको ऐसे ही सारे
13:23
कॉन्ट्रैक्ट्स और ऐसे ही रेलेवेंट लॉस में
13:25
एक्सपर्टीज चाहिए तो जाके कमर्शियल ऑन की
13:27
वेबसाइट को चेक करो। हमने ऐसे बहुत सारे
13:29
कोर्सेस आप ही के लिए बनाए हैं। तो जिससे
13:32
आपको भी बेनिफिट हो और हमें भी बेनिफिट
13:34
हो। खैर हमें तो कुछ और में बेनिफिट होगा
13:37
जो कि है ये आपका बेनिफिट ज्यादा
13:38
इंपॉर्टेंट है। क्योंकि आज की डेट में
13:41
सिर्फ जनरलिस्ट हो के कोई मतलब नहीं है।
13:43
स्पेशलाइजेशन करना बहुत इंपॉर्टेंट है। हर
13:45
चीज पे एक्सपर्टीज होनी इंपॉर्टेंट है। तो
13:48
जाओ वक्त मत बिगाड़ो। चेक आउट कम ऑन की
13:51
वेबसाइट और यह वीडियो इसके साथ शेयर करो
13:53
जिससे यह समझने की बहुत ज्यादा जरूरत है।
13:56
इसी के साथ आज आपसे विदा लेते हैं। हैव अ
13:58
गुड डे एंड स्टे ट्यून विद जस्ट।